केंद्र सरकार ने देश के भूमिहीनों को जल, जंगल और जमीन का कानूनी हक दिलाने की तैयारी शुरू कर दी है। मनरेगा के बाद यह दूसरा ऐसा कानून बनेगा, जो देश के लगभग दो करोड़ से ज्यादा परिवारों को कानूनन जमीन और आवास का हक दिलाएगा। खास बात यह है कि भूमिहीनों के लिए बनाए जाने वाले इस कानून का लाभ उन हिजड़ों को भी मिल सकता है, जिनकी गणना अभी किसी भी लिंग में नहीं होती। साथ ही उन सैकड़ों जाति के परिवार तक भी इसका फायदा पहुंचेगा, जिन जातियों का उल्लेख तक नहीं है।
भूमिहीन किसानों और आदिवासियों का नेतृत्व कर रहे एकता परिषद के सुप्रीमो राजगोपाल के मुताबिक देश में अभी भी सैकड़ों ऐसी जातियां हैं, जिनका उल्लेख किसी भी अनुसूची में नहीं है। इसके चलते उन्हें न ही राज्य सरकार और न ही केंद्र की किसी योजना का लाभ मिल पाता है। सात दशकों से ऐसी सैकड़ों जातियां अपने अधिकार के लिए संघर्षरत हैं। हालांकि कुछ राज्यों ने इन जातियों को समाज की मुख्यधारा में शामिल करने की पहल की है, लेकिन अभी तक कोई लाभ नहीं हुआ है। इसी प्रकार हिजड़ों की गणना किसी भी लिंग में नहीं होती। इससे वह भी सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं।
उन्होंने बताया कि जल, जंगल व जमीन पर कानूनी हक के लिए लड़ी जा रही लड़ाई दरअसल ऐसे ही लोगों की लड़ाई है। केंद्र सरकार ने लिखित रूप में आश्वासन दिया है कि छह महीने में कानून का मसौदा तैयार कर लिया जाएगा। इसके लिए राज्यों, सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों से भी सलाह की जाएगी। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की मानें तो मौजूदा समय में देश में लगभग दो करोड़ से ज्यादा ऐसे परिवार हैं, जो भूमिहीन और आवासहीन हैं। कानून बनने के बाद इन लोगो को भूमि और आवास का कानूनी हक उसी तरह से मिल सकेगा जैसा कि मनरेगा के तहत रोजगार का हक मिला हुआ है। वर्तमान में देश के लगभग 5 करोड़ 10 लाख लोग मनरेगा से लाभान्वित हो रहे हैं।