खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के मसले पर राजनीतिक संकट से जूझ रही यूपीए सरकार अब अविश्वास प्रस्ताव से ज्यादा एफडीआई पर वोटिंग को बड़ी चुनौती मान रही है। चौतरफा घिरी सरकार ने यूपीए सरकार के पास पर्याप्त बहुमत होने का दम भरा है। मगर एफडीआई के मुद्दे पर वोटिंग करवाने की ओर बढ़ रही माकपा और भाजपा की रणनीति से सरकार के पसीने छूट रहे हैं।
सरकार का मानना है कि अविश्वास प्रस्ताव अगर संसद में रखा जाता है तो सरकार इससे पार पा लेगी। मगर एफडीआई पर वोटिंग की नौबत सरकार पर भारी पड़ सकती है क्योंकि अभी एफडीआई पर राजनीतिक समर्थन सरकार के साथ नहीं है। सहयोगी द्रमुक ने भी खुलकर कह दिया है कि वह यूपीए सरकार के इस फैसले के साथ कतई नहीं है।
मंगलवार को अविश्वास प्रस्ताव के मसले पर ममता बनर्जी अपने धुर विरोधी माकपा के दफ्तर तक जाकर समर्थन लेने के लिए तैयार हो गईं तो दूसरी तरफ द्रमुक प्रमुख करुणानिधि ने साफ कह दिया है कि वह रिटेल एफडीआई पर सरकार के साथ नहीं हैं। दोनों राजनीतिक घटनाक्रम से यूपीए सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। ऐसे में अगर सरकार के संकटमोचक बनने वाले सपा और बसपा भी एक सुर में सरकार के खिलाफ हो जाते है तो उसका आगे का रास्ता पथरीला हो सकता है।
उधर, सरकार के मैनेजर विपक्ष की एकता में फूट डालने की रणनीति बना रहे हैं। माकपा जहां एफडीआई पर वोटिंग पर जोर दे रही है तो दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव की बात कर रही है। यूपीए केरणनीतिकार इसी मतभेद को आगे बढ़ाकर विपक्षी की एकता में चोट करने के लिए तैयार हैं।
शीतकालीन सत्र से पहले सरकार ने बार बार दावा करना शुरू कर दिया है कि यूपीए सरकार पर कोई संकट में नहीं है। संसदीय कार्य मंत्री कमल नाथ ने कहा कि सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है और वक्त आने पर वह इसे साबित भी कर देगी। लोकसभा में सदन के नेता और गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी कहा है कि हमें कोई डर नहीं हैं। हमारे पास संख्याबल है।