अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजकोहवा ने गोहत्या को राज्य में कानून-व्यवस्था का चरमरा जाने का हवाला देते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की थी।
राज्यभवन के सामने गोहत्या की फोटो पेश करते हुए राज्यपाल ने राज्य में संवैधानिक तंत्रों के तार-तार होने को आधार बताते हुए राज्य में आपातकाल लगाने की सिफारिश की थी।
राज्यपाल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सत्यपाल जैन ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट केसमक्ष यह खुलासा किया। वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्यपाल से पूछा था कि ऐसे प्रमाण दिए जाएं जिससे राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने को जायज ठहराया जा सके।
राजभवन के सामने गोहत्या का दिया गया हवाला
अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने परीक्षण करने का निर्णय लिया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए राज्य के राज्यपाल के उस रिपोर्ट को तलब किया है जिसमें राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की गई थी।
न्यायमूर्ति जेएस खेहड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने केंद्र सरकार और अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल को नोटिस जारी करते हुए शुक्रवार तक जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। अदालत ने यह निर्देश राज्य विधानसभा में कांग्रेस पार्टी के मुख्य व्हिप राजेश टैको सहित अन्य कांग्रेसी नेताओं की याचिकाओं पर दिया है।
इससे पहले केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की तकनीकी आधार पर याचिका को स्वीकार न करने की गुहार की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति शासन लगाने की अधिसूचना को याचिका में चुनौती नहीं दी गई है।
केंद्र और राज्यपाल को नोटिस
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि नियम नियम होता है और यह सभी पर लागू होता है। अदालत को भी नियमों के तहत ही काम करना चाहिए। लेकिन पीठ ने अटॉर्नी जनरल से कहा कि तकनीकी आपत्तियों को नहीं उठाया जाना चाहिए। पीठ ने याचिकाकर्ताओं को याचिकाओं में संशोधन करने की इजाजत दे दी है।
वहीं राज्यपाल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सत्यपाल जैन ने पीठ ने गुहार की कि राष्ट्रपति शासन की सिफारिश को गोपनीय रखना जरूरी है। जिस पर पीठ ने कहा कि वह बुधवार तक याचिकाकर्ताओं को सिर्फ यह जानकारी दें कि किस तारीख को राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की गई थी।
पीठ ने कहा कि सीलबंद लिफाफे में अदालत को रिपोर्ट सौंपी जाए। पीठ ने कहा कि जब तक हमें राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करने केआधारों का पता नहीं चल जाता है और आगे नहीं बढ़ सकते। पीठ ने यह भी कहा कि अंतरिम आदेश तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक राष्ट्रपति शासन लगाने केआधारों का पता नहीं चल जाता।
रिपोर्ट को गोपनीय रखने की राज्यपाल की गुहार का याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों फली एस नरीमन, कपिल सिब्बल आदि ने विरोध किया। नरीमन ने कहा कि संविधान पीठ केसमक्ष किसी रिपोर्ट को गोपनीय रखने का कोई मतलब नहीं है। अगली सुनवाई सोमवार को होगी।