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नाथूराम गोडसे की घर वापसी और आरएसएस

Fri, 30 Jan 2015 03:57 PM IST
अजित साही / वरिष्ठ पत्रकार
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सोलहवीं सदी में मार्टिन लूथर नाम के एक यूरोपियन पादरी ने कैथोलिक चर्च से बगावत कर दी। उस समय डेढ़ हजार साल पुराना ईसाई धर्म कट्टरता के चरम पर था। सिर्फ चर्च को बाइबिल समझने-समझाने का हक था। अंधविश्वास का बोलबाला था।
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चर्च की मुखालफत करने वालों को मौत मिलती थी। यूरोप के इस दौर को इतिहासकार 'डार्क एज' (अंधकार युग) कहते हैं। लूथर की ललकार ने ईसाई धर्म पर कैथोलिक चर्च का एकाधिकार को खत्म कर सुधारवादी प्रोटेस्टेंट धर्म को जन्म दिया।

कुरीतियों में लिप्त था हिंदू धर्म

इस वैचारिक आजादी के चलते सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों में यूरोप में 'एन्लाइटमेंट एज' (प्रबोधन काल) आया। यूरोप के प्रबोधन काल के दौरान तर्कसंगत दर्शन और विज्ञान, सर्वशिक्षा, सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता का जन्म हुआ। मानवीय अधिकारों पर बहस छिड़ी।

बीसवीं सदी में यूरोप और अमेरिका की आर्थिक प्रगति की नींव बनीं, ये उपलब्धियां आज दुनिया भर में उन्नति की मानदंड हैं। इसी तरह उन्नीसवीं सदी में भारत का हिंदू धर्म भी कुरीतियों में लिप्त था। राजशाही और अर्थसत्ता सवर्णों के हाथ थी। सिर्फ ब्राह्मण धार्मिक अनुष्ठान कर सकते थे।

मैला उठाने वाले 'अछूतों' का जीवन नर्क था। बेगारी और बेदखली आम थी। अंधविश्वास का जोर था। किसी को भी अधर्मी बता कर समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था।

समाज के पहले सुधारक

महिलाओं को संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता था। विधवा जीवन अपशकुन था। सती हो जाना बेहतर माना जाता था। अठारहवीं शताब्दी के अंत में अंग्रेज़ों द्वारा जमींदारी कायम किए जाने के बाद से किसानों का शोषण हद पार कर गया था। इस तरह दरिद्रता में व्यापक विस्तार हुआ। ऐसे दमन के विरोध में उन्नीसवीं शताब्दी में सुधारवाद ने ज़ोर पकड़ा।

राजाराममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे समाज सुधारकों ने अनैतिक परम्पराओं को चुनौती दी। विधवा पुनर्विवाह का समर्थन और सती प्रथा और बाल विवाह का विरोध बढ़ा।

छुआछूत पर प्रतिबंध

मोहनदास करमचंद गांधी पहले सुधारक थे जिन्होंने कहा कि हिंदू धर्म और समाज की इन बुराइयों की वजह से भारत अंग्रेजी हुकूमत के पराधीन हो गया। इस दर्शन को 1908 में गांधी ने अपनी पहली पुस्तक 'हिंद स्वराज' की शक्ल दी। अपने तमाम अखबारों, किताबों, लेखों, भाषणों और साक्षात्कारों में गांधी मरते दम तक हिंदू धर्म में व्यापक बदलाव की हिमायत करते रहे।


अस्पृश्यता के विरोध में गांधी ने मैला उठाना शुरू किया। शूद्र माने जाने वालों को हरिजन का नाम दिया और मंदिर में उनके प्रवेश पर लगी पाबंदी के विरोध में अनशन करके मंदिरों के दरवाजे खुलवाए।

अपने आश्रम में गांधी ने छुआछूत पर प्रतिबंध लगा दिया। ख़ुद को काश्तकार और हरिजन कहना शुरू किया और भारत में घूम-घूम कर किसानों के बीच स्वाधीनता संग्राम का जज़्बा जगाया।

धर्मनिरपेक्ष भारत

सर्वधर्म समभाव को हिंदू धर्म का आधारभूत बताते हुए गांधी ने हिंदू-मुस्लिम एकता के नारे को बुलंद किया। उद्योगपतियों, सामंतियों और जमींदारों को शोषण से हट कर स्वाधीनता सेनानी बनने की सीख देनी शुरू की।

गांधी की परिकल्पना के स्वतंत्र भारत में धर्म, जाति, वर्ग और लिंग पर आधारित भेदभाव के लिए जगह नहीं थी। आबादी में हिंदुओं के बहुमत के बावजूद उन्होंने स्वतंत्र भारत को धर्मनिरपेक्ष रखने कि ताकीद की।

लूथर के दौर में पुरातनवादियों के विरोध की तरह हिंदू समाज के सत्ताधारी वर्ग भी गांधी के सुधारों के डर से स्वतंत्रता-विरोधी अंग्रेज़ी हुकूमत और उसकी पिट्ठू रियासतों से लामबंद रहे।

हिंदू महासभा का गठन

साल 1914 में स्थापित हिंदू महासभा और 1925 में बने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) गांधी के सुधारवादी दर्शन के धुरविरोधी के रूप में उभरे। सवर्ण नेतृत्व में इन संगठनों की विचारधारा पुरातन और प्रतिक्रियावादी थी। 30 जनवरी 1948 को गांधी की गोली मार कर हत्या करने वाला ब्राह्मण, नाथूराम गोडसे, दोनों संगठनों के सदस्य रह चुके थे।

महात्मा गांधी के विराट दर्शन के चलते ही आज़ाद भारत में मानवीय अधिकारों, सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता और समानता को क़ानूनी सरंक्षण मिला और अस्पृश्यता, भेदभाव, बेगारी और जमींदारी को गैरकानूनी ठहराया गया। लेकिन ऐसा नहीं है कि भारत से या हिंदू समाज से शोषक वर्ग का अंत हो गया है।

अल्पसंख्यकों का डर

नए दौर में शोषण के और नए आयाम कायम हो गए हैं जिनके चलते देश में अप्रत्याशित ग़रीबी फैल गई है। क़र्ज़ में डूबे लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

करोड़ों लोग अपने खेत-ज़मीन से बेदख़ल किए जा चुके हैं। कई जगह लोगों ने सरकार और सुरक्षा बलों के ख‌िलाफ बंदूक उठा ली है। यही नहीं, पिछले साल संघ से जुड़ी भारतीय जनता पार्टी के चुनाव जीतकर देश में सत्ता हासिल करने के बाद से भारत में मज़हबी अल्पसंख्यकों में अपनी सुरक्षा को लेकर संशय बढ़ गया है।
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संघ की विचारधारा

आरएसएस की सोच में भारत के मुसलमानों का दर्ज़ा हिंदुओं से नीचे है, भाजपा की जीत से निश्चित ही संघ की गांधी विरोधी विचारधारा को शह मिली है। यही वजह है कि आज गांधी के हत्यारे गोडसे के प्रति रुचि जागृत होती दिख रही है।

हिंदू महासभा के कुछ सदस्यों ने गोडसे का मंदिर बनाने तक का एलान कर दिया है। आज हिंदू समाज एक बार फिर धर्म के दोराहे पर खड़ा है। एक रास्ता है गांधी के ओजस्वी और न्यायसंगत दर्शन का। और दूसरा है भारत को उन्नीसवीं शताब्दी के 'डार्क एज' में वापस पहुँचाने का।
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