कागजी नियमों की आड़ में लापरवाह डाक्टरों ने एक और नवजात की जान ले ली।
उत्तरप्रदेश के संभल में पैदा हुई बच्ची को सांस लेने में दिक्कत के चलते सोमवार की देर रात महिला अस्पताल लाया गया।
महिला अस्पताल में रात कोई डाक्टर नहीं था। एसएनसीयू में मौजूद स्टाफ नर्स ने परिजनों को जिला अस्पताल की इमरजेंसी में भेज दिया। इमरजेंसी में एक दिन की बच्ची को महिला अस्पताल में भर्ती किए जाने की बात कहते हुए महिला अस्पताल की ओर मोड़ दिया गया।
महिला अस्पताल में परिजनों को फटकार कर फिर इमरजेंसी भेज दिया गया। वहां से वापस भेजे गए परिजनों को महिला अस्पताल में फिर टरकाया गया। डेढ़ घंटे की जद्दोजहद के बाद महिला अस्पताल से डाक्टर ने देखते ही रेफर किया और कोठीवाल मेडिकल कालेज तक जाते-जाते बच्ची की मौत हो गई।
बच सकती थी जान
यह संभव है बच्ची की तबियत गंभीर रही हो...उसे बचाना मुश्किल रहा हो लेकिन अगर डाक्टर देख लेते तो कम से कम परिजनों को तसल्ली तो हो जाती।
यह भी हो सकता था कि वह बच जाती लेकिन एक बार फिर डाक्टरों ने डिग्री लेते वक्त जो शपथ ली थी उसे झूठा साबित कर दिया। यह बच्ची संभल जिले के महमूदपुर माफी गांव निवासी मुसलिम की थी।
सोमवार की दोपहर पैदा हुई बच्ची को गंभीर हालत होने पर जिला महिला अस्पताल मुरादाबाद के लिए रेफर किया गया था। गोद में बच्ची को लेकर इधर उधर भटकते हुए पिता की आंखों से बेबसी के आंसू छलक पड़े। गला भर्रा उठा था। बच्ची के पिता मुसलिम, परिजन मो. मुनव्वर ने कहा जिला अस्पताल में इधर उधर न दौड़ाया जाता तो शायद कोठीवाल मेडिकल कालेज में समय से बच्ची भरती हो जाती और जान बच जाती...।
'दोषियों को हटाया जाएगा'
- एक माह तक की बच्ची को महिला अस्पताल में भर्ती कर इलाज करने की सुविधा है। इसी वजह से उसे महिला अस्पताल भेजा जा रहा था। बार बार वापस आने पर परिजनों से कहा गया था कि वह चाहते हैं तो हमें इमरजेंसी वार्ड में भर्ती करने में कोई दिक्कत नहीं है।
डा. तरुण यादव एमओआईसी जिला अस्पताल
- सोमवार रात ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ से पूछताछ होगी। भले ही एसएनसीयू में गंभीर बच्चों को भर्ती करने की सुविधा नहीं है फिर भी बच्ची को भर्ती कर चाइल्ड स्पेशलिस्ट को काल किया जा सकता था। इस तरह इधर उधर दौड़ाना गलत है। ऐसे स्टाफ को हटाया जाएगा।
डा. वंदना श्रीवास्तव सीएमएस महिला अस्पताल
सिर्फ पीलिया सेंटर एसएनसीयू
जिला अस्पताल का एसएनसीयू सिर्फ पीलिया सेंटर तक सीमित रह गया है। बच्चों में पैदा होते ही सांस लेने की दिक्कत सर्वाधिक सामने आ रही है लेकिन वेंटीलेटर सहित बच्चों को कृतिम सांस देने की कोई व्यवस्था नहीं है। यह एक बड़ी समस्या है। सीएमएस डा. वंदना श्रीवास्तव कहती हैं कि हायर सेंटर सरीखी सुविधाएं यहां पर नहीं है। पीलिया, हल्के गंभीर बच्चों को ही रखने का इंतजाम है।
रात में ईएमओ तक नहीं
जिला महिला अस्पताल में नवजात और प्रसूता की जिंदगी भगवान भरोसे है। रात में इमरजेंसी मेडिकल आफिसर तक नहीं रहती।
एक स्टाफ और चतुर्थश्रेणी कर्मचारी के जरिए महिला अस्पताल में रात की इमरजेंसी चलती है। बताते हैं कि तीन की जगह एक मात्र ईएमओ की तैनाती है। एक मात्र चाइल्ड स्पेशलिस्ट से चौबीस घंटे इमरजेंसी ड्यूटी नहीं ली जा सकती।
अस्पताल में पैदा होने वाले बच्चों के अलावा बाहर से आने वाले बच्चों को देखने के लिए चाइल्ड स्पेशलिस्ट को फोन कर बुलाया जाता है। घर से अस्पताल तक पहुंचने में भी चाइल्ड स्पेशलिस्ट को कुछ समय तो लगता ही है। ऐसे में पीड़ित खासकर नवजात बच्चों की हालत अधिक बिगड़ जाती है और कई बार यह बच्चे की मौत का कारण बन जाता है।