खाद्य सुरक्षा कानून को अध्यादेश के जरिए लागू कराने के सरकार के फैसले को लेकर आम चुनाव तय वक्त से पहले होने की हलचल शुरू हो गई है।
सियासी गलियारों में इसी साल नवंबर-दिसंबर में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ ही आम चुनाव के ऐलान की बात चर्चा का विषय बनी हुई है।
सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि राहुल की सलाहकार टीम यूपीए सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को कम करने में जल्द चुनाव को कारगर विकल्प मान रही है।
इस हलचल को शायद भाजपा भी भांप रही है। इसलिए उसने भी नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में अपनी चुनावी तैयारियों को बेहद तेजी से अंजाम देना शुरू कर दिया है।
गरीबों को कम कीमत पर अनाज देने की यूपीए सरकार की योजना को अध्यादेश के जरिए लाने से चुनावी पारा चढ़ गया है। अध्यादेश को लेकर अभी कुछ दिन तक सहमति नहीं बनने की बात कही जा रही थी।
पिछली कैबिनेट बैठक में इसे टाल दिया गया था। मगर अचानक सक्रिय होकर सरकार ने इसे अध्यादेश के तौर पर कैबिनेट से मंजूरी दिलवा दी, जबकि यूपीए के प्रमुख घटक दल एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने खाद्य सुरक्षा को अध्यादेश के रास्ते लागू करने पर खुलकर ऐतराज जताया था।
यहां तक कि पिछली कैबिनेट में जब इसे टाला गया तो खुद सरकार ने विपक्ष से इस मसले पर सहमति बनाने के लिए बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी। इसके लिए बाकायदा समिति भी बनी थी।
मगर बातचीत की प्रक्रिया को दरकिनार कर सरकार के अचानक अध्यादेश के रास्ते पर दुबारा चलने से सियासी हलचल तेज हो गई है। जल्द चुनाव होने की बात को हालांकि सरकार ने खारिज किया है।
सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा है कि यह कानून गेम चेंजर है। इसे चुनाव से जोड़ा नहीं जाना चाहिए। दूसरी तरफ, भाजपा ने अपनी चुनावी तैयारियों को तेजी से निपटाना शुरू कर दिया है।
पार्टी ने बृहस्पतिवार को मोदी की मौजूदगी में संसदीय बोर्ड की बैठक में व्यापक चुनाव अभियान छेड़ दिया। भाजपा को भी जल्द चुनाव की आशंका है।
लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा भी है कि खाद्य सुरक्षा को अध्यादेश के जरिए लागू करवाने से साफ है कि कांग्रेस जल्द चुनाव करवाने के मूड में है।