हे राम...मुंह से निकले आखिरी शब्द और उन शब्दों में भी भगवान के प्रति अटूट विश्वास। तड़ तड़ तड़...एक साथ तीन गोलियां सीने में जा धंसी और सर्वजन सुखाय की कल्पना करने वाली एक महान आत्मा चिर निद्रा में सो गई। इस विश्वास के साथ कि आने वाला समय देश को समानता की राह से लेते हुए प्रगति और ले जाएगा।
अहिंसक आंदोलन के बल पर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या आज ही के दिन 1948 को हुई थी। उस समय नाथूराम गोडसे नाम के शख्स ने भारत विभाजन के नाम पर आक्रोश में आकर उनकी हत्या की थी, लेकिन गांधी सिर्फ एक बार नहीं मरे। आज समाज में उनकी विचारधारा के विपरीत माहौल बनाकर हर रोज गांधी की हत्या की जा रही है।
30 जनवरी के मनहूस दिन गांधी की मृत्यु का समाचार सुनकर सारा देश शोक में डूब गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्र को महात्मा जी की हत्या की सूचना इन शब्दों में दी, 'हमारे जीवन से प्रकाश चला गया और आज चारों तरफ़ अंधकार छा गया है। मैं नहीं जानता कि मैं आपको क्या बताऊं और कैसे बताऊं। हमारे प्यारे नेता, राष्ट्रपिता बापू अब नहीं रहे।'
विपरीत परिस्थितियों में अकसर लोग 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी' जुमले का प्रयोग करते हैं। गांधी और मजबूरी को एक साथ जोड़ने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि महात्मा गांधी अगर मजबूर होते तो आज देश शायद आजाद न होता। अगर गांधी जी मजबूरी का प्रतीक होते तो वह नमक कानून को तोड़ने के लिए सरकार के आदेश को तोड़ने का दुस्साहस ना करते। अन्याय और भेदभाव के खिलाफ तन कर खड़ा होने वाला यह निर्णायक क्षण ही गांधी को गांधी बनाता है और किसी भी अन्याय और अत्याचार का प्रतिकार करने वाले अदम्य साहस का पता देता है।
महात्मा गांधी और यहूदी आर्किटेक्ट हरमन कालेनबाख के संबंधों को लेकर हाल ही में पुल्तिजर पुरस्कार विजेता लेखक जोसेफ लेलीवेल्ड ने गांधी की जीवनी ‘ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज़ स्ट्रगल विथ इंडिया’ में कुछ सनसनीखेज बातें उठाई हैं। हालांकि विश्वास करना सहज नहीं लगता लेकिन लेलीवेल्ड ने महात्मा गांधी और कालेनबाख के बीच हुए पत्राचार का हवाला देते हुए दावा किया था कि दोनों के बीच समलैंगिक संबंध थे। यह किताब 2011 में प्रकाशित हुई थी, जिसको लेकर अभी भी विवाद जारी है।