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50वीं पुण्यतिथि पर: यादों के झुरमुट में मुक्तिबोध

Thu, 11 Sep 2014 01:24 PM IST
कनक तिवारी
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मुक्तिबोध को 1958 में साइंस कॉलेज रायपुर के प्रथम वर्ष के छात्र के रूप में देखा सुना था। वे राजनांदगांव के दिग्विजय महाविद्यालय में आ गए थे। अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. करने के दौरान मुझे कई बार उनसे मिलने का अवसर तलाशना पड़ा।
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पांच वर्ष बाद मैं दिग्विजय महाविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त होकर उनका सहकर्मी बना। तब तक मुक्तिबोध की सुपात्रित वह ख्याति नहीं थी, जिसका बवंडर उनकी मृत्यु के बाद अचानक उठा।

ब्रह्मराक्षस, ओरांग उटांग, क्लॉड ईथर्ली जैसे बीसियों अटपटे नामों की विकृतियों की भी सुसंगतता निर्धारित कर यह कवि उन्हें अभिव्यक्ति की धमनभट्टी में गलाकर कविता के उत्पाद में बदल देने की वैज्ञानिक वृत्ति का प्रयोगधर्मी रहा है। उनके प्रतीकों में अंधेरा, काला जल, सर्प, पत्थर, मृत्यु, चीत्कार वगैरह की परछाइयां नहीं, झाइयां कविता के चेहरे पर इस तरह उगी हैं कि इन्सानी विकृतियों में काव्यात्मकता बूझने की समझ विकसित है।
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मुक्तिबोध में समय के आगे के इतिहास को बूझने की शक्ति थी। उसकी वैज्ञानिक अभिव्यक्ति उन्होंने खुद से जद्दोजहद करती तराशी हुई भाषा में परवर्ती पीढ़ियों की विश्व बिरादरी के लिए परोसने की कोशिश की।

उनके साहित्य का दुनिया की तमाम भाषाओं में अनुकूलता की समझ के साथ अनुवाद हुआ है। मुक्तिबोध भौगोलिक सीमा में बंधे केवल भारतीय कवि नहीं हैं। उन्हें विश्व कविता की समझ के एक प्रयोगशील हस्ताक्षर की तरह समझा जाना चाहिए। सड़क पर चलते 'एक साहित्यिक की डायरी' के टूटते जुड़ते विवरण रास्ते भर मुझे किसी दूसरी दुनिया में भेजते। मुक्तिबोध की मृत्यु-पूर्व अचेतन अवस्था ने सिद्ध किया कि उनके काव्य-बिंब बेहद असामान्य मानसिक स्थितियों में उपचेतन के कोलाज़ की तरह उभरते होते थे। साधारण जुमला है कि निराला ने व्यवहारगत एब्नॉर्मल होने के बावजूद नॉर्मल कविताएं लिखीं।

अपने व्यवहार में बेहद अनुशासित और करुणामय होने के बावजूद मुक्तिबोध की कविता का बड़ा अंश एब्नॉर्मेलिटी के लिबास में मनुष्यता का जनस्वीकृत हलफनामा है।
 
दिग्विजय महाविद्यालय से सटे बूढ़ासागर की पथरीली पटरियों पर बैठकर 'आशंका के द्वीपः अंधेरे में' का एकल श्रोता बनना मेरे नसीब में आया। वह कविता युवा श्रोता-शिष्य में घबराहट, कोलाहल, आक्रोश और जुगुप्सा भरती गई।

मुक्तिबोध का अविस्मरणीय काव्यपाठ चलता रहा, जब तक सूरज पूरी तरह बूढ़ासागर में डूब नहीं गया। एक अमर कविता के अनावृत्त होने के रहस्य को देखना कालजयी क्षण जीना था। मैं हतप्रभ, आतंकित और भौंचक था। पहली बार लगा था कि कविता हमारे अस्तित्व को न केवल झकझोर सकती है, बल्कि वंशानुगत और पूर्वग्रहित धारणाओं तक की सभी मनःस्थितियों से बेदखल भी कर सकती है।

पाठक या श्रोता का व्यापक मनुष्य समाज में गहरा विश्वास हो जाए और खुद उसमें किसी अणु के विस्फोट का संसार बन जाए-यह मुक्तिबोध की उस कविता का बाह्यांतरिक भूचाल है। 'अंधेरे में' आंतरिक उजास की कविता है। वह भारतीय जनता का लोकतांत्रिक घोषणापत्र है। यह आंशिक और अपूर्ण, लेकिन आत्मिक-लयबद्धता का ऐलान है। मुक्तिबोध संभावित जनविद्रोह की निस्सारता से बेखबर नहीं थे।

इसलिए इस महान कविता में लाचारी का अरण्यरोदन नहीं, उसकी हताशा की कलात्मक अनुभूति है। पराजित, पीड़ित और नेस्तनाबूद हो जाने पर भी आस्था और उद्दाम संभावनाओं की उर्वरता के यौगिक बिखेर देना कविता की रचनात्मक जिम्मेदारी होती है। यह तयशुदा पाठ इस विद्रोही का ऐसा ऐलान है, जिसे जनसमर्थन तो चाहिए लेकिन जनआकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के लिए वह प्रतीक्षा करने की स्थिति में नहीं है। 'अंधेरे में' की दृश्यसंभावनाओं, नाटकीयता और अतिरेक लगती संभाव्यता में मुक्तिबोध की कलम की बहुआयामिता का अनोखा और अकाट्य साक्ष्य गूंजता रहता है।
 
एक कविता कहती है, 'पता नहीं कब कौन कहां किस ओर मिले।' कोई पचास बरस बाद मैं उन्हें नहीं, शायद मुक्तिबोध मुझे खोज रहे हैं। इस कवि से मेरा निजता का रिश्ता रहा है, लेकिन शायद कविता से उतना नहीं। मुक्तिबोध की कविताओं में स्वप्न का जटिल बिम्ब विधान अनायास है। जीवन का यथार्थ उनके सपनों से भी झरता था। बाद में यह प्रामाणिक सिद्ध हुआ कि उनके सपनों में भी कविता ही तो रही है।

हमें अक्सर लगता कि वे बातें करते-करते अपनी कविता में खो जाते। वे निश्च्छल भाषा के जरिए कविता को बहुआयामी बना देने के समर्थ शब्द-कारीगर भी लगते। वह विद्रोह का जनदस्तावेज इस तरह भी रचते, जिसके लिए टकसाल में गढ़ी किसी समकालीन या अंतर्राष्ट्रीय भाषा के विन्यास के लिए सायास उत्प्रेरण नहीं करना हो। मुक्तिबोध सदैव मनुष्य बने रहे। उनके मन में जो कुछ छूट जाता, वही चकरघिन्नी की तरह घूमता रहता। फिर कविता के गर्भगृह में तब्दील होता।

वार्तालाप-निपुण मुक्तिबोध की आंखों से सम्मोहन जैसा कुछ झरता रहता था। मैं कविता के बाल प्राइमर की पाठशाला में था। मुक्तिबोध उसका खुला विश्वविद्यालय थे। लगता उनमें सांसों का जो उतार चढ़ाव प्रवहमान है, वही कविता है। मुझे कवि से ज्यादा कवि होने की पृष्ठभूमि पर भरोसा रहता। भ्रम होता कि कविता को समझाने के अय्यार बने वे अपनी वैयक्तिकता को मेरी आंखों में ठूंस तो नहीं रहे हैं।

उनकी विनम्रता में सबसे पहले और सबसे ज्यादा समाज-सार्थक व्यंग्य आज भी दिखाई पड़ता है। मुक्तिबोध की दृढ़ हनु का फलितार्थ तब समझ नहीं आया था। अपनी निस्संगता महसूस करते मुक्तिबोध हर वक्त रचनात्मक उर्वरता की स्थिति में जीते। व्यापक भारतीय जीवन के कोलाहल की जो ध्वनि हहराती थी, उसे भी उन्होंने अपनी कविता की सिम्फनी बना दिया। वे शास्त्रीय संगीत के आदिम ध्रुपद राग की तरह के बेलौस गायक थे। ज्ञानेन्द्रियां ही तो उनकी कविता को समझने का माध्यम हैं।       
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