आपराधिक मामलों में किसी भी अदालत से मिली दो साल या उससे अधिक अवधि की सजा जनप्रतिनिधियों पर भारी पड़ेगी।
सुप्रीम कोर्ट के ऐसे जनप्रतिनिधियों की सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द होने संबंधी फैसले से राजनीतिक दल सन्न हैं। हालांकि संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञों के साथ-साथ समाज के सभी वर्गों ने इस फैसले को हाथों-हाथ लिया है।
इनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला गंदे नाले में तब्दील होती जा रही भारतीय राजनीति को साफ-सुथरा बनाने के नए द्वार खोलेगा।
इनका यह भी मानना है कि चूंकि राजनीतिक दलों ने राजनीति को साफ करने के बदले इसे गंदा करने में अपनी भूमिका निभाई, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इतना बड़ा फैसला करना पड़ा। इस फैसले से राजनीतिक दलों का सकते में आना स्वाभाविक है।
वर्तमान में देश भर के 31 फीसदी सांसद और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। जाहिर है कि ऐसे जनप्रतिनिधि सभी दलों में शामिल हैं।
लोकसभा के महासचिव रहे सुभाष कश्यप ने इस फैसले को ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने कहा कि आपराधिक रिकॉर्ड वाले जनप्रतिनिधि निचली अदालत के फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देकर बच निकलते थे। मगर अब जनप्रतिनिधित्व की धारा 8(4) के निरस्त हो जाने से ऐसा नहीं हो पाएगा।
कश्यप ने कहा कि दुख इस बात का है कि जो काम कानून के माध्यम से होना चाहिए था, उसमें शीर्ष अदालत को आगे आना पड़ा क्योंकि सभी राजनीतिक दल इस भ्रष्ट व्यवस्था के पैरोकार बन गए थे।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने भी इस फैसले को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने चुनाव सुधार के लिए तमाम कोशिशें की, मगर राजनीतिक दल इन प्रयासों का समर्थन करने के बदले इसके खिलाफ एकजुट हो गए। अब इस फैसले के बाद राजनीतिक व्यवस्था में साफ सफाई की शुरुआत होगी।
इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गईं वरिष्ठ अधिवक्ता लिली थॉमस ने भी इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इस फैसले ने राजनीतिक दलों और सरकार से सारे बहाने छीन लिए हैं। इसलिए चुनाव सुधारों की दिशा में यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा।
चुनाव सुधारों के लिए राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाने की लंबी लड़ाई लड़ने वाले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) के संयोजक अनिल बैरवाल ने कहा कि दरअसल राजनीतिक दलों ने खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है।
वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में शामिल दल खुद ही इस व्यवस्था को पूरी तरह भ्रष्ट बना देना चाहते थे। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को मजबूर होकर इतना कड़ा और इतना बड़ा फैसला लेना पड़ा।
राजनीति के अपराधीकरण के कुछ तथ्यः-
--देश भर के कुल 31 फीसदी जनप्रतिनिधि दागी।
--लोकसभा के 543 सांसदों में से 162 के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित।
--देश भर के 4835 सांसदों और विधायकों में से 1448 दागी।
--इन 1448 जनप्रतिनिधियों में से 641 के खिलाफ हत्या, बलात्कार, अपहरण, डकैती, शोषण जैसे संगीन मामले दर्ज।
--अन्य 807 जनप्रतिनिधियों के खिलाफ धमकी देने, चोरी करने, हाथ उठाने, लूटपाट करने, लोगों को भड़काने जैसे मामले।
--ज्यादातर आपराधिक रिकॉर्ड वाले जनप्रतिनिधि क्षेत्रीय दलों के।