खाद्य सुरक्षा विधेयक को अध्यादेश के जरिए लागू करने की कोशिश में एक बार फिर नाकाम रही सरकार भले ही कुछ बहाना करे लेकिन यूपीए सरकार और कांग्रेस में ही मतभेदों के चलते सोनिया गांधी का यह सियासी सामाजिक एजेंडा कैबिनेट की सीमा से पार नहीं हो पाया।
पवार को ऐतराज
कृषि मंत्री शरद पवार ही नहीं बल्कि कई केंद्रीय मंत्रियों के अध्यादेश को लेकर ऐतराज के चलते इसे टालने की पटकथा कैबिनेट की बैठक से पहले ही लिख दी गई थी।
कैबिनेट की बैठक में खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष के विरोध को दूर करने का तर्क देकर अध्यादेश के विचार को फिलहाल टालने की बात कह दी।
खाद्य सुरक्षा विधेयक को अध्यादेश के जरिए लागू करने पर पवार ने खुलकर ऐतराज जताया था।
सरकार के अंदर मतभेद
कांग्रेस और सरकार के अंदर भी अध्यादेश को लेकर जबरदस्त विरोध बना हुआ था। कई मंत्रियों ने अपनी नाखुशी हाईकमान को जता भी दी थी।
वित्त मंत्री पी चिदंबरम, कानून मंत्री कपिल सिब्बल और खाद्य मंत्री केवी थॉमस बिल को अध्यादेश के रूप में लागू करवाने के पक्ष में नहीं थे। जबकि रक्षा मंत्री एके एंटनी और संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ सरीखे कुछ मंत्री अध्यादेश की वकालत कर रहे थे।
सरकार के अंदर जबरदस्त विरोध को देखकर बृहस्पतिवार सुबह ही यह तय कर लिया गया था कि कैबिनेट की बैठक में इसे टाल देना ही ठीक रहेगा।
विपक्ष का विरोध
सूत्रों ने बताया कि बैठक में प्रधानमंत्री ने खुद इसकी पहल करते हुए कहा कि अध्यादेश के मुद्दे पर विपक्ष का ऐतराज सामने आ रहा है।
लोकतांत्रिक देश में विपक्ष से बातचीत की प्रक्रिया को अपनाना चाहिए। प्रधानमंत्री का इतना कहना भर था कि वित्त मंत्री ने बिल को टालने की बात सिरे चढ़ा दी।
बाकी मंत्रियों ने भी तुरंत सहमति जता दी। खास बात यह रही कि पवार पूरी बैठक के दौरान चुप रहे। उन्होंने एक शब्द नहीं बोला, जबकि अध्यादेश के समर्थक मंत्रियों ने भी प्रधानमंत्री की पहल को देखते हुए कुछ बोलना मुनासिब नहीं समझा।
दरअसल, सरकार और पार्टी के अंदर मत विभाजन के चलते हाईकमान नहीं चाहता था कि इसे अध्यादेश के जरिए लाने की जिद कर फजीहत कराई जाए। लिहाजा, विपक्ष से बातचीत करने के बाद ही आगे बढ़ने पर सोचा गया है।