लालू प्रसाद यादव 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में दूसरी बार जीत हासिल कर अपने राजनीतिक चरमोत्कर्ष पर पहुंचे ही थे कि उसी समय उनके पतन की पटकथा की एक गुमनाम शिकायत से शुरुआत हुई।
तब अविभाजित बिहार के चाईबासा के डिप्टी कमिश्नर (डीसी) को एक गुप्त शिकायत से पशुपालन विभाग में हो रहे मवेशियों के चारे की खुलेआम लूट की शिकायत मिली।
शुरुआती जांच के बाद जनवरी 1996 में चाईबासा के ईमानदार और अक्खड़ डीसी अमित खरे ने सघन छापेमारी की और घोटाले से एक-एक कर पर्दा उठने लगा।
दूसरी बार मुख्यमंत्री बने लालू यादव अंदाजा नहीं लगा पाए कि मवेशियों के चारे की लूट में कानून का लंबा मगर मजबूत पंजा उनकी गिरेबान को भी दबोच लेगा।
अपनी लोकप्रिय राजनीति के बूते डंडे की सियासत हांक कर रहे लालू को पहली बार हालात की गर्मी का एहसास फरवरी 1996 में हुआ, तो उन्होंने इसकी जांच के लिए एक कमेटी बैठा दी।
इस कमेटी में ज्यादातर सदस्य वे ही थे, जो खुद घोटाले के सवालों के कठघरे में थे। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका ने लालू का खेल और खराब कर दिया।
11 मार्च, 1996 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पटना हाईकोर्ट ने चारा घोटाले की जांच सीबीआई को सौंप दी। इसी महीने की 27 तारीख को सीबीआई ने चाईबासा ट्रेजरी केस में एफआईआर दर्ज कर ली।
लालू तब तक संभल चुके थे। जांच से संबंधित सुबूतों और फाइलों को इकट्ठा करने में सीबीआई के पसीने निकल गए।
सीबीआई ने अदालत से शिकायत की कि राजनीतिक नेतृत्व, बिहार सरकार और माफिया मिलीभगत कर जांच में रोड़े अटका रहे हैं।
इतना ही नहीं सीबीआई पर आरोपियों और गवाहों से जोर जबरदस्ती करने के कई संगीन आरोप लगे।
मामला काफी गंभीर हो गया जब व्यापारी और मामले के आरोपी हरीश खंडेलवाल की लाश रेलवे लाइन पर मिली। उनके पास से एक पर्ची बरामद की गई, जिसमें सीबीआई की ओर से प्रताड़ित करने की बात लिखी गई थी।
तमाम उठापटक के बावजूद अदालत ने जांच जारी रखने का आदेश दिया। करीब तेरह महीने की जांच के बाद 23 जून 1997 को सीबीआई ने मामले की चार्जशीट दायर कर दी, जिसमें लालू प्रसाद को आरोपी बनाया गया।
करीब महीने भर बाद 30 जुलाई 1997 को लालू ने सीबीआई कोर्ट के आगे समर्पण कर दिया। उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया और वह करीब 18 महीने तक जेल में रहे।
बिहार और केंद्र की राजनीति के बीच फरवरी 2002 को रांची की विशेष सीबीआई अदालत में मुकदमा शुरू हुआ।
लालू के साथ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र और छह अन्य राजनीतिक नेताओं व चार आईएएस अधिकारियों सहित कुल 45 लोग दोषी पाए गए।