गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जब लोकसभा चुनावों में भाजपा की नैया पार लगाने के लिए देश के कोने-कोने में रैलियां कर रहे हैं, तब उनका 'आपणो गुजरात' बारिश और बाढ़ की तबाही से जूझ रहा है।
120 करोड़ हिंदुस्तानियों की चिंता में डूबे मोदी के छह करोड़ गुजराती भाइयों में से हजारों भाई बारिश और बाढ़ में फंसे हैं।
लेकिन राज्य सरकार ने अभी तक किसानों की बर्बाद फसल के मुआवजे और अपने घरों से विस्थापित लोगों के लिए प्रतिदिन दी जाने वाली नकद सहायता राशि की कोई घोषणा नहीं की।
पिछले कुछ दिनों से गुजरात में लगातार भारी बारिश हो रही है, जिसकी वजह से राज्य की कई नदियां उफान पर हैं। जहां अहमदाबाद, सूरत, वड़ोदरा, भरूच, राजकोट, भावनगर, जामनगर, पोरबंदर आदि शहरों में भारी बारिश से जन जीवन अस्तव्यस्त हो गया और शहरों की सीवर व्यवस्था की पोल खुल गई।
जगह जगह जल भराव से बीमारियों का खतरा पैदा हो गया, वहीं ताप्ती, नर्मदा, विश्वामित्री, गोंडली, बादर आदि नदियों में बाढ़ की वजह से सूरत, वड़ोदरा, भरूच जिलों, और सौराष्ट्र के राजकोट, अमरेली, पोरबंदर, भावनगर, जामनगर के कई गावों में किसानों की तबाही बढ़ गई है।
फसलें हुईं बर्बाद
फसल बर्बाद हो गई है और हजारों लोग घर से बेघर होकर सुरक्षित स्थानों की तलाश में विस्थापित हो रहे हैं।
गुजरात परिवर्तन पार्टी के महासचिव और राज्य के पूर्व गृह राज्य मंत्री गोरधन झड़फिया कहते हैं कि पूरे देश में गुजरात के विकास का ढिंढोरा पीटने वाले मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने राज्य में बाढ़ से तबाह हो रहे लोगों की परवाह नहीं है।
झड़फिया कहते हैं कि मोरवी बांध टूटने के बाद जब बाढ़ का खतरा पैदा हुआ था तब तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबू भाई जसभाई पटेल 15 दिनों तक बाढग़्रस्त इलाके में डेरा डालकर राहत कार्यों की निगरानी करते रहे थे।
2001 में जब सूरत में बाढ़ आई तो तत्कालीन मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल तीन दिन तक पानी के बीच में ही रहे। इसी तरह भुज में भूकंप के बाद केशूभाई वहां पहुंच गए थे।
लेकिन मौजूदा मुख्यमंत्री को रेवाड़ी, भोपाल, दिल्ली जाने और घूम घूम कर रैलियां करने का वक्त तो है, लेकिन बाढ़ पीडि़तों के बीच जाने का मौका नहीं है।
झड़फिया ने मांग की है कि तत्कालीन राज्य सरकार बाढ़ पीडि़तों के लिए मुआवजे, किसानों की तबाव फसल का हर्जाना और बेघरबार लोगों को प्रतिदिन मिलने वाला नकद अनुदान देने की घोषणा करें।