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पांच चीजें जो सोनिया नहीं कर सकीं

Thu, 14 Mar 2013 04:51 PM IST
सुदीप ठाकुर, सीनियर एसोसिएट एडिटर
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राजीव गांधी की मौत के बाद बिखर रही कांग्रेस को संभालने के इरादे से राजनीति में आई सोनिया गांधी ने बतौर कांग्रेस अध्यक्ष अपने 15 साल पूरे कर लिए हैं।
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सोनिया 1998 में सीताराम केसरी को बेदखल कर कांग्रेस अध्यक्ष पद पर काबिज हुई थीं। तब कांग्रेस की हालत खस्ताहाल थी, केंद्र समेत कई राज्यों मे पार्टी सत्ता से बाहर हो चुकी थी।

मगर इतने लंबी अवधि के बावजूद कांग्रेस में कुछ ऐसी चीजें हैं, जो या तो वे बदल नहीं सकीं या उन्हें बदलना उनके बस में ही नहीं था। पांच चीजें वह नहीं बदल सकीं...
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1- आंतरिक लोकतंत्र

कांग्रेस भले ही लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई दे, मगर हकीकत यह है कि ब्लाक स्तर से लेकर शीर्ष पदों पर नियुक्ति का आधार लोकतांत्रिक नहीं है। वह बीते दिनों की बात है जब चवन्नी में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर कोई आम कार्यकर्ता अपनी मेहनत के दम पर आगे बढ़ सकता था।

पार्टी के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने पिछले वर्ष जुलाई में एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था, इंदिरा गांधी के बाद कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और पार्टी के आम कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय नहीं है। सोनिया इस स्थिति को दूर नहीं कर सकी हैं।

2- चापलूसी

यों कांग्रेस का यह चारित्रिक गुण है, इसलिए यह कल्पना नहीं की जा सकती कि पार्टी इससे पूरी तरह मुक्त हो पाएगी। मगर सोनिया के कार्यकाल में चापलूसी के ऐसे किस्से भी हैं, जिन्होंने उस कांग्रेस की याद दिला दी है जब कहा जाता था, इंदिरा इज इंडिया।

वर्ष 2004 के उस चर्चित घटनाक्रम के बाद एक टीवी चैनल के मालिक और तमिलनाडु के एक कांग्रेसी नेता एच वसंतकुमार ने सोनिया को मदर इंडिया ही बना दिया!

यही नहीं इस पूर्व कांग्रेसी विधायक ने पहली जनवरी, 2012 को सोनिया को नववर्ष की बधाई देते हुए एक विज्ञापन प्रकाशित करवाया, जिसमें लिखा था, हमें भारत पर गर्व है, हमें सोनिया पर गर्व है।

3- गुटबाजी

निश्चित ही सोनिया और राहुल पार्टी के शीर्ष पर हैं, मगर पार्टी प्रादेशिक स्तर पर पनपने वाली गुटबाजी की गिरफ्त में है। सोनिया इसे दूर नहीं कर पाई हैं।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ इस गुटबाजी का सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जहां भाजपा तीसरी बार आश्वस्त लग रही है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस की कमान निर्मल खत्री को दी गई है, बावजूद इसके कि पार्टी में दूसरे कई दिग्गज मौजूद हैं। इसका खामियाजा पार्टी की खेमेबंदी के रूप में देखा जा सकता है।

4- नया नेतृत्व

राहुल गांधी ने भावकुता में कहा है कि वह इसलिए विवाह नहीं करना चाहते क्योंकि जब बच्चे होंगे तो उनमें भी उनकी जगह लेने की स्वाभाविक इच्छा जाग जाएगी। यह कितना बड़ा विरोधाभास है! सोनिया को भी अंततः भरोसा राहुल पर ही करना पड़ा है।

मुश्किल यह है कि पार्टी में कोई नया नेतृत्व उभर ही नहीं पा रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, जतीन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा को तो लोकतांत्रिक तरीके से उभरे नेता के तौर पर नहीं रखा जा सकता।

5- नया नारा नहीं

बेशक, सोनिया की अध्यक्षता में कांग्रेस ने लगातार दो बार आम चुनाव जीता है, मगर वह पार्टी को कोई नया नारा नहीं दे पाई हैं। उनकी तुलना अक्सर उनकी सास इंदिरा गांधी से की जाती है। मगर इंदिरा के उलट सोनिया के पास ऐसा कोई नारा नहीं है जिससे उनके राजनीतिक दर्शन को पार्टी कार्यकर्ता आम लोगों तक पहुंचा सकें।
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निश्चित ही, यूपीए सरकार की खाद्य सुरक्षा से लेकर भूमि सुधार की नीतियों में सोनिया की अगुआई वाले राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का प्रभाव दिखता है, मगर इन नीतियों के लिए वह 1980 के दशक के उसी नारे के साथ है, जिसे इंदिरा ने दिया था, कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ।
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