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लोकसभा की इन 5 बातों ने झुकाया देश का सिर

Sat, 22 Feb 2014 05:07 PM IST
प्रमोद जोशी/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम
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15वीं लोकसभा को ये श्रेय जाता है कि उसने नागरिकों को शिक्षा का अधिकार दिया। खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण कानून बनाए और 'विसिल ब्लोवर' संरक्षण और लोकपाल विधेयक पास किए।
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बेशक वैश्विक मंदी के दौर में देश की अर्थव्यवस्था के अचानक धीमी पड़ने और अनेक प्रकार के राजनीतिक विवादों का सीधा असर संसदीय कामकाज पर भी पड़ा।

इस लिहाज से इस लोकसभा ने देश के संसदीय इतिहास के सबसे चुनौती भरे समय को देखा। इसकी उपलब्धियों को हमेशा याद रखा जाएगा लेकिन इस दौरान कुछ ऐसी बातें हुईं, जिन्हें टाला जा सकता था या बेहतर तरीके से निपटाया जा सकता था।

पेपर-स्प्रे का इस्तेमाल

इस लोकसभा के आख़िरी सत्र में मिर्च के स्प्रे, सदस्यों के निलंबन और लगातार शोर-गुल ने संसदीय कर्म में गिरावट का जो परिचय दिया, उसे देर तक याद रखा जाएगा।

अंतरिम रेल बजट पेश करते वक्त रेल मंत्री का भाषण सदन के पटल पर रखकर काम चलाया गया। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, जब केंद्रीय मंत्री अपनी सरकार का विरोध व्यक्त करते हुए 'वेल' में उतरे हों।

आम बजट और रेल बजट बगैर चर्चा के पास हो गए। ऐसा न होता तो अच्छा था।

विधेयकों का लैप्स होना

सन 1952 से 1967 तक पहली तीन लोकसभाओं की औसतन 600 के आसपास बैठकें हुईं थीं। 15वीं लोकसभा की साढ़े तीन सौ के आसपास बैठकें हुईं। हालांकि पूरी तरह पुष्ट प्रमाणित तथ्य अभी उपलब्ध नहीं हैं, पर अनुमान है कि इस लोकसभा का लगभग 37 फीसदी समय शोर-गुल और व्यवधानों के कारण बरबाद हुआ।

विधेयकों और बजट प्रस्तावों पर चर्चा में शामिल होने, प्रश्नोत्तर काल और संसदीय समितियों में सक्रिय भागीदारी से संसदीय कर्म की उपयोगिता साबित होती है। संसदीय बैठकों के समय के साथ-साथ गुणात्मक रूप से श्रेष्ठ समय लोकतांत्रिक व्यवस्था को पुष्ट बनाने के लिए ज़रूरी है।

पहली लोकसभा ने 333 विधेयक पास किए थे और 15वीं लोकसभा ने इसके लगभग आधे। आर्थिक उदारीकरण से जुड़े अनेक विधेयकों को पास नहीं किया जा सका। जीएसटी और डायरेक्ट कोड जैसे काम अधूरे रह गए। बांग्लादेश के साथ सीमा को लेकर समझौता नहीं हो पाया। लोकसभा में पड़े सत्तर के आसपास बिल लैप्स हो गए। इतनी बड़ी संख्या में बिल पहले कभी लैप्स नहीं हुए।

रेलमंत्री का बदला जाना

24 नवम्बर 2011 को केंद्र सरकार ने मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी विदेशी निवेश का फैसला किया। इसके फौरन बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उस फैसले को वापस लेने की घोषणा कर दी। कई दिन तक अटपटी स्थिति बनी रही।

इसके बाद फरवरी 2012 में तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने रेल बजट पेश किया, जिसमें किराया-भाड़ा बढ़ाने का प्रस्ताव था।

ममता बनर्जी ने न सिर्फ उस घोषणा की निंदा की, बल्कि रेल मंत्री को पद से हटाने का फैसला भी सुना दिया। ऐसा पहली बार हुआ जब रेल बजट एक मंत्री ने पेश किया और उसे पास करते वक्त दूसरे मंत्री थे। संसदीय राजनीति के लिए ऐसी घटनाएं अटपटी थीं।

संसदीय समितियों का राजनीतिकरण

सन 2010 के लोकसभा का छठा सत्र लगभग पूरी तरह 2जी 'घोटाले' को लेकर संयुक्त संसदीय समिति बनाने की माँग के कारण ठप रहा। अंततः संयुक्त संसदीय समिति बनी, पर उसकी रिपोर्ट को लेकर आख़िर तक खींचतान होती रही।

2जी मामले को लेकर लोकलेखा समिति के अंदर मतभेद उभरे और कुछ सदस्यों ने दावा किया कि बहुमत के आधार पर उन्होंने रिपोर्ट के मसौदे को ख़ारिज कर दिया है।

इतना ही नहीं लोकलेखा समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी को हटाने और उनके स्थान पर सैफ़ुद्दीन सोज़ को अध्यक्ष बनाने की घोषणा कर दी। संसदीय संस्थाओं का इस हद तक राजनीतिकरण शुभ लक्षण नहीं है। इनका राजनीतिकरण न हो तो अच्छा है।
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महिला विधेयक की अनदेखी

15वीं लोकसभा में 61 महिला सदस्य चुनकर आईं थीं। अब तक की लोकसभा में महिलाओं का यह सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधित्व था। मोटे तौर पर यह कुल सदस्यों का ग्यारह फीसदी है। महिला आरक्षण विधेयक यह संख्या 33 फीसदी करना चाहता है। वर्तमान महिला सदस्यों की तिगुनी या दूसरे शब्दों में कहें तो 180 के आसपास।

सन 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार ने पहली बार लोकसभा में यह विधेयक पेश किया था। पर यह पास नहीं हुआ। उम्मीद थी कि यूपीए की महिला अध्यक्ष और लोकसभा की महिला अध्यक्ष की निगहबानी में 15वीं लोकसभा इसे पास करेगी और देश की पहली महिला राष्ट्रपति इस कानून पर दस्तखत करेंगी। सदन की शुरुआत करते हुए चार जून 2009 को पहले संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कहा था कि इस बार महिला आरक्षण विधेयक संसद से पास कराया जाएगा। ऐसा हो नहीं पाया। अंतिम सत्र के समापन से दो दिन पहले जयाप्रदा ने यह मुद्दा उठाया। पर हुआ कुछ नहीं।

नौ मार्च 2010 को यह बिल राज्यसभा से पास हो चुका है, पर लोकसभा ने इसे पास नहीं किया। हाल में दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणामों से एक बात साबित हुई कि महिलाओं के वोट महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं। महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के बजाय उसे रोकना संसदीय राजनीति के लिए शुभ लक्षण नहीं।
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