वाराणसी दुनिया के सबसे पुराने और लगातार जीवंत रहने वाले शहरों में शुमार है। यह खासा तेवर वाला शहर है। वाराणसी के लोगों के साथ एक खासी बौद्धिक परंपरा जुड़ी है। असहमति और बहस इस परंपरा के अहम तत्व हैं। काशी की चेतना का यही वह खास पहलू है, जो यहां चुनाव लड़ने वाले किसी भी उम्मीदवार में घबराहट पैदा कर सकता है।
वाराणसी के वोटर भाजपा के पीएम उम्मीदवार को एक मौका देना चाहते हैं। उन्हें अगर कोई थोड़ी चुनौती देता नजर आता है तो वह हैं अरविंद केजरीवाल। केजरीवाल यहां के विचारशील लोगों के एक बड़े समूह को भा सकते हैं। इसलिए अच्छे-खासे समर्थन के बावजूद मोदी को यहां चौकन्ना रहना होगा। अगर मोदी जीतते भी हैं तो केजरीवाल उनकी जीत के अंतर को कम कर सकते हैं।
मोदी के खिलाफ केजरीवाल को समर्थन
पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान हजारों आप कार्यकर्ता वाराणसी पहुंच चुके हैं और मोदी के खिलाफ अपनी लड़ाई पूरी शिद्दत से लड़ रहे हैं। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने भी अपनी ताकत केजरीवाल के पीछे लगा दी है।
नीतीश कुमार ने खुलेआम कहा है कि जनता दल (यूनाइटेड) आम आदमी पार्टी का समर्थन करेगी। इस बात की अटकलबाजियां तेज है कि आखिरी वक्त में समाजवादी पार्टी के पिछड़े समर्थकों के कुछ वोट केजरीवाल के खाते में जा सकते हैं।
हालांकि यह देखना अजीब लग रहा है कि अपने उम्मीदवारों का हौसला बुलंद करने के लिए न तो मायावती और न ही मुलायम सिंह यादव ने ही वाराणसी में अब तक कोई चुनावी रैली की है। क्या यह कोई गुप्त रणनीति है?
कांटे की टक्कर में जीते थे जोशी
मोदी और केजरीवाल के हंगामेदार प्रचार के बरक्स कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय चुपचाप अपने अभियान में लगे हैं। वह खुद को सिर्फ ‘वाराणसी का बेटा’ कह कर वोट मांग रहे हैं। राय वाराणसी और आसपास के इलाकों में खासे लोकप्रिय हैं। वह वाराणसी के विधानसभा क्षेत्रों में से एक से लगातार विधानसभा का चुनाव जीतते आए हैं।
शादी-विवाह और दूसरे सामाजिक आयोजनों में लोगों की खुलकर मदद करने में वह खासे सक्रिय हैं। इसी लोकप्रियता की बदौलत 2009 के लोकसभा चुनाव में अजय राय ने 18 फीसदी वोट हासिल कर लिए थे और तीसरे स्थान पर रहे थे।
वाराणसी का चुनाव जीतने वाले मुरली मनोहर जोशी को 30 फीसदी वोट हासिल हुए थे और दूसरे स्थान पर रहने वाले मुख्तार अंसारी के खाते में 28.5 फीसदी वोट आए थे। यह कांटे की टक्कर थी और जोशी सिर्फ 17000 वोटों से जीते थे।
केजरीवाल की ओर खिसक रहे मुस्लिम
निश्चित तौर पर इस बार हालात दूसरे होंगे। भले ही मुख्तार ने अजय राय को समर्थन देकर अपनी दावेदारी वापस ले ली हो लेकिन यह कहना मुश्किल है कि उनके पक्के समर्थकों के वोट राय को ही मिलेंगे। ज्यादातर मुस्लिम वोट केजरीवाल के पाले में जाते दिख रहे हैं।
वाराणसी में 2009 का चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया था। यही वजह है कि दोनों स्थानीय ताकतवर और चर्चित उम्मीदवारों को भारी वोट मिले थे। लेकिन इस बार मोदी और केजरीवाल की मौजूदगी की वजह से वाराणसी का वोटर उनके उठाए राष्ट्रीय मुद्दों पर सोच सकता है। इसलिए 2009 में राय और मुख्तार को मिले वोटों का काफी हिस्सा मोदी या केजरीवाल की झोली में गिर सकता है।
एक चीज तो साफ दिख रही है कि यहां के तीन लाख से ज्यादा मुसलमान हर बीतते दिन के साथ केजरीवाल की ओर खिसक रहे हैं। इसके पीछे आप कार्यकर्ताओं की ओर से वाराणसी के दूर-दराज गांवों में किए जा रहे व्यवस्थित प्रचार का हाथ है।
अगड़ी जातियों के वोट बटेंगे: अजय राय
कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय ने कहा कि इस बार अगड़ी जातियों के वोट भी बंटेंगे। वह यह कहना चाह रहे हैं कि ब्राह्मण शायद इस बार मोदी को वोट न दें। राय खुद भूमिहार हैं और उन्हें उम्मीद है कि वाराणसी में इस जाति के एक लाख से ज्यादा वोटों का खासा हिस्सा उन्हें मिलेगा।
वाराणसी में सबसे ज्यादा बड़ा वोट बैंक पिछड़ों का है। लोकसभा क्षेत्र के 16 लाख वोटरों में से सात लाख पिछड़े वोटर हैं। दबे-छिपे तौर पर ही सही लेकिन भाजपा पिछड़ी जाति से आने वाले मोदी के इस पहलू को भुनाने में लगी है। मोदी को पिछड़े वोटों का खासा हिस्सा हासिल हो सकता है।
प्रचार के आखिरी दौर में मोदी सबसे आगे दिख रहे हैं लेकिन केजरीवाल चौंकाने वाले नतीजे दे सकते हैं। कम से कम वह मोदी की जीत के अंतर को कम तो कर ही सकते हैं। लगता है कि वाराणसी का वोटर अपने खास अंदाज में मोदी को यह जता देना चाहता है उन्हें उनका समर्थन मिलेगा लेकिन वह उसकी इस प्रतिबद्धता को हल्के में न लें।