रिटेल में एफडीआई से रोजगार, कृषि और देश में ढांचागत सुविधाओं की प्रगति के मुद्दे पर बृहस्पतिवार को राज्यसभा में पक्ष और विपक्ष में जमकर बहस हुई। विपक्षी दलों ने तर्क दिया कि इससे खुदरा व्यापार से जुड़े रोजगार खत्म हो जाएंगे और सभी वर्गों को नुकसान पहुंचेगा। दूसरी ओर, सरकार ने कहा कि इससे देश की तरक्की की दिशा तय होगी। यह फैसला सभी वर्गों की समृद्धि के लिए लिया गया है।
राज्यसभा में कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने कहा कि एफडीआई से कारोबार संगठित होगा और इससे देश में सकल घरेलू उत्पाद को बढ़ाने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि सरकार हमेशा गरीबों के हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय करती है और एफडीआई के निर्णय से देश का भला होगा।
इससे पहले चर्चा की शुरुआत करते हुए अन्नाद्रमुक के सदस्य वी. मैत्रेयन ने कहा कि प्रधानमंत्री जब राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे तो उन्होंने एफडीआई का विरोध किया था। यही नहीं, 2005 में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री से एफडीआई का प्रभाव जानना चाहा था। माकपा के सांसद सीताराम येचुरी ने कहा कि यह मुद्दा धर्मनिरपेक्षता या सांप्रदायिकता का नहीं, बल्कि आर्थिक नीति से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने बताया कि 1998 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार करीब चार करोड़ से ज्यादा लोग असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे थे। एफडीआई नीति से 20.25 करोड़ लोगों के भविष्य पर असर पड़ेगा। वालमार्ट कम से कम रोजगार देकर ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनी है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि यह अल्पमत की सरकार है, जो देश पर अपने निर्णय थोप रही है।
हम एफडीआई नीति को तब मानेंगे जब मुर्शिदाबाद की साड़ी ऑस्ट्रेलिया में बिकने लगे और जयपुर में विकलांगों के लिए बनाए जाने वाला नकली पैर जमैका में मिले। जद-यू के सांसद एनके सिंह ने कहा कि एनडीए सरकार ने इस नीति को कभी मंजूर नहीं किया था। उन्होंने प्रधानमंत्री से जानना चाहा कि क्या आर्थिक सुधारों में सबसे अहम एफडीआई का मामला ही था।