फरीदकोट के पूर्व महाराजा की बेटियों ने 23 साल लंबी चली कानूनी जंग जीत ली है। अदालत ने महाराजा की संपत्ति पर कब्जा जमाने वाले ट्रस्ट का पंजीकरण रद्द कर दिया है और लगभग 20 हजार करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति उनकी दोनों बेटियों को सौंप दी है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि पूर्व महाराजा की संपत्ति ट्रस्ट ने जाली वसीयत के जरिए हड़पी थी, जिसे उनके अधिकारियों ओर नौकरों ने बनाया था। इन लोगों ने फर्जी तरीके से वसीयत पर महाराज के हस्ताक्षर ले लिया थे।
महाराजा का परिवार
फरीदकोट के महाराजा हरिंदर सिंह बरार की तीन बेटियां अमृत कौर, दीपिंदर कौर, महिपींदर कौर और एक बेटे टिका हरमोहिंदर सिंह बरार थे।
इकलौते बेटे की 1981 में मौत हो जाने के बाद महाराज का दिमागी संतुलन खो दिया। उसी समय एक ट्रस्ट मेहरवाल खेवाजी ट्रस्ट का पंजीकरण किया गया और उनकी सारी संपत्ति पर इसका कब्जा हो गया।
इस ट्रस्ट में उनके कुछ नौकर सदस्य के रूप में शामिल थे, जबकि उनकी दोनों बेटियों को अध्यक्ष के रूप में एक हजार रुपए और 12 सौ रुपए मासिक दिया जाता था।
1989 में जब महाराज की मौत हो गई तो ट्रस्ट ने उनकी सारी संपत्ति पर अपना कब्जा जमा लिया।
महाराजा की संपत्ति
महाराज की संपत्ति कई जगहों पर है। इनमें राजधानी दिल्ली के कोपरनिकस मार्ग पर स्थित फरीदकोट हाउस, चंडीगढ़ के मणी माजरा इलाके में 350 साल पुराना किला, फरीदकोट का महल और किला आंध्रप्रद्रेश और हिमाचल की संपत्ति और फरीदकोट में 200 एकड़ में फैला एयरोड्रम शामिल है।
इसके अलावा स्टैंडर्ड चार्ट्ड बैक एवं अन्य बैंकों में जमा एक हजार करोड़ रुपए के जेवरात और रॉल्स रॉयस सहित कई महंगी गाडियां भी महाराजा के पास थीं, जो अब उनकी बेटियों को मिलेंगी।
23 साल चला मुकदमा
अमृत कौर ने ट्रस्ट के खिलाफ 1990 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था और उनका कहना था कि ट्रस्ट ने उनके पिता से जबरन दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराया था।
उनके पिता उस समय विक्षिप्त हो चुके थे, इसीलिए यह वसीयत नकली है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट रजनीश कुमार ने गत गुरुवार को दोनों राजकुमारियों के पक्ष में फैसला सुनाया।
महाराज की तीसरी बेटी ने शादी नहीं की थी और 2001 में रहस्मय परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई थी।