'मैं भी तू भी यात्री, आती जाती रेल। अपने-अपने गांव तक सबका सबसे मेल'। निदा फाजली का ये दोहा उन्हीं की जिंदगी में सच हो गया। निदा फाजली का गांव आ गया। वो इस दुनिया-ए-फानी की रेल से उतरकर अपने उस गांव चले गए, जहां से कोई वापिस नहीं आता। मशहूर शायर निदा फाजली का आज 77 साल की उम्र में इंतकाल हो गया है।
कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
आओ कहीं शराब पिएं रात हो गई।
नक्शा उठाके कोई नया शहर ढूंढ़िए
इस शहर में तो सबसे मुलाकात हो गई।
निदा के मायने आवाज या पुकार' के होते हैं। हर वालिद की ख्वाहिश होती है कि उसका बेटा मशहूर हो। मगर निदा जिस तरह दुनियाभर के उर्दू बोलने की आवाज बन गए, उस तरह उनके नाम के सच हो जाने के बारे में तो शायद निदा के वालिद ने भी ना सोचा होगा। निदा पिछले कई दशकों से उर्दू मुशायरों और फिल्मी गीतकार के तौर पर जाना-पहचाना नाम हैं।
आमिर खान की फिल्म सरफरोश में नसीरुद्दीन शाह पर फिल्माई गई और जगजीत सिंह की गाई 'होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है' हिन्दी सिनेमा की यादगार गजलों में एक है। ये गजल जिस शायर की कलम से निकली उनका नाम है, निदा फाजली। निदा ने गजल, नज्म, दोहे हर लहजे में शोहरत पाई।
निदा फाजली का इस दुनिया से जाना दुनियाभर के उर्दू के चाहने वालों का नुकसान है। भारतीय सिनेमा का नुकसान है। उन सबका नुकसान है जो चाहते हैं कि भारत के मंदिरों में मुसलमान भजन गाएं और मस्जिदों की हिफाजत के लिए हिन्दू सामने आएं। उन सब का नुकसान है जो इस मुल्क के मुसलमानों को गंगा में वुजू करके नमाज पढ़ते देखना चाहते हैं।
निदा फाजली 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में पैदा हुए। लेकिन वो अभी बचपने में ही थे कि देश के दो टुकड़े हो गए। 1947 में बड़े-बड़े कलेजे वाले हार मान बैठे थे। जिन लोगों ने अपना घर छोड़ नए बने मुल्क की राह पकड़ी, उनमें निदा फाजली के शायर पिता भी थे। लेकिन 9 साल के निदा ने पिता के इस फैसले पर बगावत कर दी। ये झलक थी निदा के आने वाले वक्त में कुछ अलग करने की।
दिल में ना हो जुर्रत तो मुहब्बत नहीं मिलती
खैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती।
कुछ लोग जमाने में यूं ही हम से भी खफा हैं
हर एक से अपनी ये तबीयत नहीं मिलती।।