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क्लीनिकल ट्रायल पर केंद्र व राज्यों से जवाब तलब

Mon, 08 Oct 2012 11:26 PM IST
नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो
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दवाओं के चिकित्सकीय परीक्षण (क्लीनिकल ट्रायल) के लिए इंसानों को कथित रूप से बलि का बकरा बनाए जाने पर गंभीर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र और सभी राज्य सरकारों से जवाब तलब किया। इस मामले पर दायर जनहित याचिका में निजी दवा कंपनियों की ओर से किए जाने वाले इन परीक्षणों पर रोक लगाने की मांग शीर्षस्थ अदालत से की गई है।
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जस्टिस आरएम लोढ़ा व जस्टिस एआर दवे की पीठ ने केंद्र सरकार से ऐसे मामलों में अब तक हुई मौतों सहित चार बिंदुओं पर ब्योरा तलब किया है। केंद्र से ऐसी दवाओं के दुष्प्रभावों, उनकी संख्या व प्रकृति और पीड़ितों या उनके परिजनों को दिए गए मुआवजे की जानकारी देने का भी निर्देश दिया है। शीर्षस्थ अदालत ने यह निर्देश एनजीओ स्वास्थ्य अधिकार मंच की ओर से दायर जनहित याचिका पर जारी किया है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि तमाम फार्मा कंपनियों की ओर से देशभर में बड़े पैमाने पर अपनी दवाओं के चिकित्सकीय परीक्षण में भारतीय नागरिकों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। सर्वोच्च अदालत ने एडिशनल सॉलिसीटर जनरल सिद्धार्थ लूथरा से कहा कि पीठ एक लाइन का निर्देश भी जारी कर सकती है कि बहुत से लोगों को प्रभावित करने वाले इस प्रकार के सभी चिकित्सकीय परीक्षणों पर रोक लगाई जाए। हम इस मसले पर बहुत गंभीर है। हालांकि परीक्षणों पर सीधे पूरी तरह से रोक न लगाते हुए पीठ ने चार मुद्दों पर केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया।
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इन चार मुद्दों में एक  जनवरी 2005 से 30 जून, 2012 के बीच चिकित्सकीय परीक्षण के लिए केंद्र को मिले आवेदनों की संख्या का मुद्दा भी शामिल है। वहीं एनजीओ का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता संजय पारिख ने आरोप लगाया कि कई फार्मा कंपनियों की ओर से संचालित चिकित्सकीय परीक्षण कई राज्यों में भेदभावपूर्ण तरीके से लागू किए जा रहे हैं।

एनजीओ की इस दलील पर आपत्ति जताते हुए मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कहा कि परीक्षणों के लिए राज्यों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि केंद्र इस मामले में राज्यों से सलाह मशविरा किए बिना ही इन परीक्षणों को मंजूरी प्रदान करती है। लेकिन यह तर्क पीठ के गले नहीं उतरा जिसने कहा कि चिकित्सकीय परीक्षण राज्य सरकारों के सरकारी अस्पतालों में संचालित किए गए जिनके कर्मचारी और डॉक्टर संबंधित राज्य सरकारों के नियंत्रण में आते हैं।
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