निठारी कांड में दोशी पाए गए सुरेंद्र कोली की फांसी पर सुप्रीम कोर्ट ने सात दिनों के लिए रोक लगा दी है। 12 तारीख को उसे फांसी दी जानी थे लेकिन सुबह करीब चार बजे मेरठ जेल प्रशासन के पास जो फैक्स पहुंचा उसमें फांसी की सजा रोकने को कहा गया था।
विज्ञापन
मेरठ जेल प्रशासन ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश फैक्स के माध्यम से प्राप्त किया गया। जेल अधीक्षक ने बताया कि मेरठ के जिलाधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में बताया जिसमें एक हफ्ते के लिए फांसी रोकने को कहा गया है।
सुरेंद्र कोली नोएडा के चर्चित निठारी कांड में दोषी पाया गया था और कोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी। डासना जेल में फांसी की सुविधा नहीं होने के कारण उसे मेरठ लाया गया था। कोली बृहस्पतिवार रात डासना से मेरठ जेल में शिफ्ट हुआ था। इसके बाद शुक्रवार को इस संबंध में कोई खास तैयारी नहीं हो पाई। शनिवार को नैनी से फंदा और कुंडा जेल में पहुंचा था।
विज्ञापन
कोली को फांसी 48 घंटे में संभव
वरिष्ठ जेल अधीक्षक एसएचएम रिजवी का कहना है कि, ऐसे मामलों में सब कुछ पहले ही तय होता है। हम अपनी तैयारी के अलावा सभी पहलुओं का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं। मानवता के नाते यह भी कोशिश कर रहे हैं कि अंतिम क्षणों तक कोली को उसके परिजनों से मिला दिया जाए। उन्होंने बताया कि ऐसे समय में मानसिक स्थिति बदलती ही है, लेकिन कोली शारीरिक रूप से फिट है। परिजनों ने भी अभी तक कोई संपर्क नहीं किया है। अंतिम समय तक सभी विकल्प खुले रखे जाते हैं।
सीबीआई कोर्ट द्वारा कोली का डेथ वारंट जारी करने और उसे मेरठ जेल में फांसी देने की तिथि 7 से 12 सितंबर के बीच तय की गई थी। कयास थे कि रविवार तड़के (सात सिंतबर को) उसे फांसी दे दी जाएगी। लेकिन जेल प्रशासन का पूरा दिन तैयारियां पूरी करने में ही बीता। दोपहर तीन बजे पवन जल्लाद जेल पहुंचा। उसने करीब दो घंटे फांसीघर की टेक्निकल समस्या दूर की। फंदा लगाते हुए फांसीघर के नट-बोल्ट से लेकर ग्रीस और ऑयलिंग की। इस दौरान तीन बार डेमो करते हुए फांसीघर को चलाया गया।
व्यवहार में बदलाव से टेंशन में जेल प्रशासन
वरिष्ठ जेल अधीक्षक के अनुसार कोली ने रविवार को कोई डिमांड नहीं की। अपने परिजनों से मिलने की इच्छा भी नहीं जताई। जेल प्रशासन का मानना है कि कोली की मां उससे अंतिम क्षणों में मिलना चाहती है तो इसका मौका दिया जाना चाहिए। लेकिन समय कम है और यह संभव नहीं दिखता।
रविवार सुबह सुरेंद्र कोली से किसी मंत्री और उसके तथाकथित दोस्त के मुलाकात की चर्चा रही। बताया गया कि मंत्री ने कोली से मुलाकात करने की इच्छा जेल प्रशासन से जताई थी। हालांकि, जेल प्रशासन ने किसी से भी कोली की मुलाकात की पुष्टि से इनकार किया है। वरिष्ठ जेल अधीक्षक का कहना है कि कोली को सिर्फ उसके निकटतम रिश्तेदारों (मां, पत्नी या बच्चों) से ही मुलाकात की अनुमति दी जा सकती है।
डासना से मेरठ जेल शिफ्ट होने के बाद से ही सुरेंद्र कोली की शारीरिक और मानसिक स्थिति के अलावा उसके व्यवहार पर लगातार नजर रखी जा रही है। शनिवार को भी वह फिट पाया गया था। उसने मनोचिकित्सक के सभी सवालों के सहज भाव में जवाब दिए थे। लेकिन रविवार को हुए रुटीन चेकअप में उसकी मानसिक स्थिति में बदलाव बताया गया। डॉक्टरों ने सवाल किए तो उसने अनमने ढंग से जवाब दिए। वह ज्यादा बोला नहीं। उससे पूछा गया कि कोई तकलीफ है तो भी चुप रहा। डॉक्टरों को उसके चेहरे पर अवसाद के लक्षण नजर आए।
जेल में नर पिशाच की फांसी का रीटेक
जेल सूत्रों के अनुसार शनिवार रात तक कोली का व्यवहार सही था। ऐसा लगता था कि उसे पता नहीं था कि उसे जल्दी फांसी दी जा सकती है। रविवार सुबह से उसके व्यवहार में बदलाव के पीछे यही वजह मानी जा रही है। उसे पता चल गया है कि कभी भी फांसी पर लटकाया जा सकता है। सूत्रों की मानें तो रविवार को कोली ने इस बारे में पूछना भी चाहा- मैं कब लटकूंगा फांसी पर। वह तन्हाई बैरक में लगातार बढ़ी आवाजाही से भी सशंकित है। इसलिए मेडिकल परीक्षण कराने में भी उसने दिलचस्पी नहीं ली।
जेल प्रशासन इस वजह से ही किसी को फांसी की स्पष्ट तारीख बताने से हिचकता है कि कैदी को पता न चल जाए। माना जा रहा है कि जेल के ही कर्मचारियों की आपसी बातचीत में कोली को पता लगा कि उसे कभी भी फांसी पर लटका दिया जाएगा। निठारी के नर पिशाच सुरेंद्र कोली को कैसे फांसी दी जाएगी, रविवार दोपहर जेल में इसका ट्रायल किया गया। पवन जल्लाद और जेल अफसरों की मौजूदगी में कोली को प्रतीकात्मक फांसी दी गई। मोटे तौर पर सब कुछ ठीक पाया गया। मामूली कमियां तुरंत दूर कर ली गईं।
फांसीघर में रखे जिस ढांचे पर कोली को लटकाया जाएगा, उसे नट-बोल्ट कसते हुए ग्रीसिंग और ऑयलिंग की गई। सभी पार्ट्स को बारीकी से चेक किया गया। फांसी देने के लिए कुंडे पर रस्सा चढ़ाया गया। यह रस्सा इलाहाबाद की नैनी जेल से मंगवाया गया है। रविवार को कोली के वजन के बराबर बोरे में रेत भरी गई। उसके मुंह पर रस्से का फंदा कसते हुए फट्टों के बीचोंबीच रखा गया। सब कुछ सेट होने के बाद उल्टी गिनती गिनी गई। वह क्षण आते ही एक अफसर ने हाथ से इशारा किया और जल्लाद ने लीवर दबा दिया। एक झटके में फट्टे अंदर की तरफ विपरीत दिशा में खुल गए और बोरा गड्ढे में समा गया।
तीन बाई तीन का यह फट्टा दो पल्लों में होता है। इस पर उसे खड़ा किया जाता है, जिसे फांसी देनी होती है। इस फट्टे के नीचे करीब सात फीट गहरा गड्ढा होता है। फांसी देने में करीब 15 मीटर रस्से का प्रयोग होता है। ये फट्टे लोहे की रॉड पर टिके होते हैं। यह रॉड लीवर से जुड़ी होती है। फांसी देने के लिए तख्ते पर खड़ा कर गले में फंदा कसा जाएगा। जल्लाद पूरी प्रक्रिया के बाद लीवर दबाएगा तो यह रॉड अपनी जगह छोड़ देगा।
इसके बाद दोनों फट्टे विपरीत दिशा में नीचे की तरफ खुल जाएंगे। पैर गड्ढे में लटकते ही फंदा पूरी तरह से गले में कस जाएगा। सामान्यत: किसी के द्वारा खुद फांसी लगाने में गले की हड्डी टूटती है। यहां भी ऐसा ही होता है। निश्चित समय के बाद वहां मौजूद डॉक्टर द्वारा मृत घोषित किया जाता है। मिथक यह भी है कि तीन बार लगातार फांसी देने के बाद भी यदि कैदी नहीं मरता है तो प्रक्रिया रोक दी जाती है। हालांकि, अफसर इस बारे में कोई जानकारी न होने की बात कहते हैं।
वरिष्ठ जेल अधीक्षक के अनुसार किसी को फांसी देने के दौरान फांसीघर में जेल अधीक्षक और डॉक्टर के अलावा प्रशासनिक मजिस्ट्रेट मौजूद रहता है। मजिस्ट्रेट ही फांसी देने की प्रक्रिया पूरी कराता है। मेरठ जेल प्रशासन से सुरेंद्र को फांसी की सजा की जानकारी आधिकारिक तौर पर उसके परिजनों को नहीं दी गई है और ना ही उसके डेथ वारंट पर उसकी मां के अंगूठे का निशान ही लिया गया है। यह कहना है उत्तराखंड के अल्मोड़ा में मंगरूखाल गांव के प्रधान आनंद राम का। बकौल आनंद राम अब तक गांव में कोई भी सरकारी नुमाइंदा डेथ वारंट लेकर नहीं पहुंचा है। न्यायालय ने निठारी कांड में सुरेंद्र कोली को फांसी की सजा सुनाई है। फांसी के लिए उसे मेरठ की जेल शिफ्ट कर दिया गया है।
फांसी दिए जाने से पूर्व आरोपी के परिजनों के पास इसकी सूचना विधिवत दी जानी जरूरी है, लेकिन सुरेंद्र के मंगरुखाल स्थित घर में उसकी मां को इस संबंध में सरकारी स्तर पर कोई सूचना नहीं दी गई है। उन्हें मात्र सूचना माध्यमों से बेटे को फांसी की सजा दिए जाने का पता चला है।