इसे कुदरत का करिश्मा नहीं तो और क्या कहेंगे कि एचआईवी पॉजिटिव दंपति के यहां एचआईवी नेगेटिव संतान जन्म ले रही हैं। अकेले गुड़गांव में इस साल अभी तक 12 ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। केवल जिले ही नहीं, बल्कि प्रदेश भर में कई ऐसे एड्स रोगी हैं, जो कि इस लाइलाज बीमारी की चपेट में होते हुए भी सुखमय वैवाहिक जीवन गुजार रहे हैं।
इंटीग्रेटिड काउंसलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर की काउंसलर पूनम राठी बताती हैं कि इस साल अभी तक सिविल अस्पताल में 12 एड्स रोगी महिलाओं की डिलीवरी हो चुकी है। सभी मामलों में शिशु को एचआईवी नेगेटिव पाया गया। अगर महिला एचआईवी नेगेटिव है तो केवल 30 फीसदी मामलों में शिशु को एचआईवी होने का अंदेशा रहता है। इनमें से ज्यादातर शिशु डेढ़ माह बाद एचआईवी से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं।
उन्होंने दावा किया कि अपने अभी तक के कैरियर में उन्होंने केवल एक मामला ऐसा देखा, जहां शिशु 18 माह बाद भी एचआईवी पॉजिटिव रहा। शेष मामलों में या तो शिशु जन्म के बाद से ही एचआईवी नेगेटिव था या 18 माह बाद उसने इस रोग से निजात पा ली।
नेगेटिव का पॉजिटिव होने की संभावना शून्य
अगर शिशु शुरू में ही एचआईवी नेगेटिव हो तो उसके 18 माह बाद एचआईवी पॉजिटिव होने की संभावना बिल्कुल नहीं है। चिकित्सक भी मानते हैं कि एड्स रोगी भी शत प्रतिशत एचआईवी नेगेटिव संतान की प्राप्ति कर सकते हैं, लेकिन यह तभी मुमकिन हो पाता है, जब डिलीवरी सही परामर्श के साथ किसी बेहतर प्रसूति केंद्र में कराई जाए।
कई जोड़े बिता रहे हैं वैवाहिक जीवन
एड्स रोगियों के लिए काम कर रही संस्था एनपीपी की प्रधान बताती हैं कि पिछले तीन साल के दौरान सात एड्स रोगियों के विवाह करा चुकी हैं। इनमें से दो जोड़े ऐसे हैं, जिन्हें हाल ही में संतान की प्राप्ति हुई है। खुशी की बात यह है कि तमाम आशंकाओं के बावजूद उनके यहां जन्मे शिशु एड्स नेगेटिव हैं। उन्होंने कहा कि समाज में आज भी एचआईवी पॉजिटिव लोगों को स्वीकार्यता नहीं मिल सकी है। ऐसे में एक दूसरे का साथ ही एड्स रोगियों को विवाह के लिए प्रेरित कर रहा है। चूंकि अब बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध हैं, लिहाजा वंश को आगे बढ़ाने की इच्छा भी पूरी होने लगी है।
'एड्स रोगियों को संतान प्राप्ति का फैसला लेने से पहले चिकित्सीय परामर्श अवश्य ले लेना चाहिए। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण है, जहां एड्स पीड़ित दंपति के यहां किसी एचआईवी नेगेटिव शिशु ने जन्म लिया। फिर भी इस दिशा में बेहद ही सावधानी बरतने की जरूरत है।'
- डॉ. विजय कुमार, डिप्टी सिविल सर्जन, एड्स, टीबी व लेप्रोसी