मॉरीशस में भारतवंशियों के नाम की अंग्रेजी स्पेलिंग से आप चक्कर खा सकते हैं। लगभग 150 वर्षों की विरासत और विभिन्न संस्कृतियों के प्रभाव ने उसे व्यापक तरीके से प्रभावित किया है।
मॉरीशस में नाम भारतीयों से एकदम अलग हैं, प्रथम नाम तो एकदम भारतीयों की तरह है भले ही उसकी रोमन स्पेलिंग थोड़ी अलग हो, यहां जाति संबंधी सरनेम लगाने की परंपरा नहीं है। उसके बजाए यहां प्रथम नाम की तरह ही उपनाम रखा जाता है जो बताता है कि वे किस खानदान से ताल्लुक रखते हैं।
मसलन मॉरीशस के राष्ट्रपति राजकेश्वर प्रयाग हैं। इसका अर्थ है कि उनका नाम राजकेश्वर है और उनके पूर्वज प्रयाग थे जो संभवत भारत से मॉरीशस आने वाले उनके परिवार के पहले सदस्य रहे होंगे।
मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीन रामगुलाम हैं और वह देश के राष्ट्रपिता माने जाने वाले सर शिवशंकर रामगुलाम के बेटे हैं और उनके परिवार के रामगुलाम मॉरीशस की जमीन पर पैर रखने वाले पहले व्यक्ति रहे होंगे।
गजाधर परिवार मॉरीशस का जाना माना परिवार है। उस परिवार की प्रसिद्ध मीडियाकर्मी मधु गजाधर का कहना है कि शुरुआती दौर में जब भारत से लोग बंधुआ मजदूर की तरह लाए गए तो उस दौरान शासन फ्रेंच लोगों के हाथों में था। उनके यहां पहले सरनेम यानी उपनाम लिखने की परंपरा है।
भारतीय लोगों से जब पूछा गया तो उन्होंने भारतीय परंपरा के अनुसार नाम बताए और फ्रेंच कुछ समझे और कुछ नहीं समझे और बिहारी सिंह का नाम सिंह बिहारी हो गया। बाद में प्रथम नाम बदलते गए लेकिन बाद का सरनेम वही रहा और परिवार की पहचान बन गया।
हालांकि सभी मामलों में ऐसा नहीं है कि जातिसूचक नाम लोगों ने हटा दिए हों, किशन नामक एक नौजवान ने बताया कि उसके पिता का नाम प्रेमदत्त चौहान है। लेकिन नामों की अंग्रेजी या रोमन स्पेलिंग को गौर करें तो आप चकरा जाएंगे।
खुद राष्ट्रपति प्रयाग ‘पुरयाग’ लिखते हैं। प्रेमदत्त चौहान की स्पेलिंग के हिसाब से नाम ‘चुहान’ हो जाएगा। ज्ञानदेव ‘गियानदेव’ हो जाएंगे। राष्ट्रपिता शिवसागर रामगुलाम की अंग्रेजी स्पेलिंग के हिसाब से ‘शीवोसागुर’ हो जाएंगे।
मॉरीशस विश्वविद्यालय से संबंद्ध इतिहासकार डॉक्टर विजय तिलक कहती हैं कि भारत से ज्यादातर पिछड़ी जातियों के लोगों को गिरमिटिया मजदूर की तरह लाया गया और एक संभावना यह भी है, जाति से मॉरीशस में उन्हें छुटकारा मिल गया हो और उन्होंने सरनेम को हमेशा के लिए त्याग दिया हो।
डॉक्टर तिलक ने एक और दिलचस्प जानकारी दी कि भारत से लाए ज्यादातर लोग गन्ने के खेतों में काम करते थे और ज्यादातर मजदूरों के छांटने में उनके हाथों पर विशेष गौर किया जाता था। अगर उनके हाथ नाजुक होते तो माना जाता था कि उन्हें मेहनत मजदूरी की आदत नहीं है और कड़े हाथों वालों को प्राथमिकता दी जाती थी। डॉक्टर तिलक कहती हैं कि भारतवंशियों के इस इतिहास पर अभी और काम किया जाना बाकी है।
एक है आप्रवासी घाट
मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुइस में समुद्र के किनारे एक आप्रवासी घाट स्थापित है, इस स्थान पर लगभग साढ़े चार लाख लोग समुद्र के रास्ते लाए गए थे जिनमें अधिकतर भारतवंशी थे। उतरने के बाद उन्हें यहां दो से तीन दिन रखा जाता था।
डॉक्टरी जांच और रजिस्ट्रेशन होता था और फिर उन्हें उनके मालिकों को सौंप दिया जाता था। इस ऐतिहासिक स्थान पर इंदिरा गांधी, एपीजे कलाम से लेकर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तक जा चुके हैं, यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर इमारत घोषित किया है।