फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

जानिए, जुर्म के सरताज पर मौत ने कैसे मारा झपट्टा

जरायम की दुनिया का खिलाड़ी कहलाने वाले राहुल खट्टा पर सुरक्षित ‘किला’ छोड़ते ही मौत ने झपट्टा मारा है। वेस्ट यूपी में बड़ी वारदात में खट्टा गैंग का नाम पुलिस महकमे में सबसे पहले आता था। उसकी सटीक लोकेशन सरधना इलाके में लगातार मिलती थी। इसके बावजूद पुलिस और एसटीएफ उसको पकड़ने में नाकाम हो रही थी।


कुख्यात राहुल खट्टा वारदात करने के बाद सरधना इलाके में छिपता था। इसकी जानकारी पुलिस के तमाम अधिकारियों को थी। सरधना राहुल खट्टा का सेफ इलाका था। आईजी जोन और डीआईजी रेंज ने सरधना के जंगल में ड्रोन तक चलवाया, इसके बावजूद पुलिस को सफलता नहीं मिली। दो माह पहले खट्टा गैंग ने सरधना इलाका छोड़कर सहारनपुर में अपने दूर के रिश्तेदार के यहां पर शरण ली थी। एक माह तक खट्टा शांत रहा और बाद सहारनपुर इलाके में लूटपाट करने लगा।

चार दिन पहले देवबंद के पंजाब नेशनल बैंक में दिनदहाड़े दस लाख की डकैती डालने पर राहुल खट्टा गैंग का नाम पुलिस में आया था। उसके बाद पुलिस लगातार उसको ट्रेस करने में लगी थी। शुक्रवार दोपहर खट्टा थाना भवन में एक व्यापारी को रंगदारी न देने पर धमकी देकर आया था। तभी पुलिस ने उसका पीछा किया। खट्टा सहारनपुर के इलाके से अनजान था। पुलिस ने सटीक मुखबिरी होने पर घेराबंदी की और उसको मार गिराया।


राहुल खट्टा बागपत के खट्टा गांव का निवासी था लेकिन वह अधिकांश सरधना इलाके में अपने रिश्तेदारों के यहां पर रहा। सरधना में चप्पे चप्पे से खट्टा पूरी तरह वाकिफ था। पुलिस कौन से रास्ते से आती व उसको कौन से रास्ते से भागना है, यह जानकारी उसको थी, लेकिन सहारनपुर इलाके में अनजान होने के चलते खट्टा को भागने का मौका ही नहीं मिला।

पूरी फिल्मी है खट्टा के एनकाउंटर की कहानी

कहानी फिल्मी जैसी है, मगर है सच। राहुल खट्टा की घेराबंदी के लिए पुलिस ने नाटकीय अंदाज में फाइनेंस और चार्टर्ड अकाउंटेंट का ऑफिस खुलवाया। खट्टा के करीबी बदमाश के जरिये सूचना भी पहुंचाई गई कि यहां 20 से 30 लाख रुपये का लेनदेन होता है, ताकि खट्टा आए और मुठभेड़ में उसे दबोच लिया जाए। हालांकि उसी दौरान मेरठ में मुठभेड़ में एक सिपाही की हत्या तथा राहुल खट्टा के पास अत्याधुनिक असलहों की जानकारी होने पर पुलिस ने अपनी प्लानिंग पलट दी और ऑफिस बंद कर दिया था।

इसकी पटकथा डीआईजी रेंज रमित शर्मा ने नवंबर 2014 में तैयार कराई। तब राहुल खट्टा गैंग के एक बदमाश को तरह-तरह के प्रलोभन देकर पुलिस ने अपना मुखबिर बना लिया। उसी ने पुलिस को बताया था कि राहुल खट्टा की निगाहें मोटे कैश को तलाशती हैं। जैसे ही भनक लगे कि कहीं 10 से 20 लाख हाथ लग सकते हैं, तो राहुल खट्टा रेकी शुरू करा देता और फिल्डिंग लगा देता है।
 
इसी के चलते डीआईजी ने चार पुलिसकर्मियों को फर्जी सीए (चार्टर्ड अकाउंटेंट) बनाकर नोएडा में ऑफिस खुलवाया। बाकायदा ऑफिस के बाहर बोर्ड और अंदर कंप्यूटर से लेकर ऐसा माहौल बना दिया, जैसे यहां काफी समय से ऑफिस संचालित है। पुलिस वाले सादे कपड़ों में वहां बैठते थे, जबकि बाहर आसपास में भी पुलिसकर्मी निगाहें जमाए रहते थे। इसके बाद मुखबिर के जरिये खट्टा तक सूचना पहुंचाई गई कि इस ऑफिस में मोटा पैसा लाया जाता है।

पुलिस को पता था कि राहुल खट्टा के पास कारबाइन, एसएलआर और पिस्टल रहती हैं। एक बार बागपत के गांव में जब राहुल खट्टा बारात में पहुंचा था तो पुलिस को उसकी जानकारी हो गई थी। इसी तरह सरधना क्षेत्र के गांव में खट्टा की मौजूदगी का पता चला था। तब राहुल खट्टा की गिरफ्तारी के ऑपरेशन में लगे पुलिसकर्मियों ने उच्चाधिकारियों से पूछा था कि क्या मुठभेड़ कर ली जाए, तो उन्हें जवाब दिया गया कि पुलिसवाले कम हो, तो लौट जाओ। क्योंकि राहुल खट्टा और उसके साथी अत्याधुनिक असलहों से लैस रहते हैं। यदि गोलियां चल गई तो पुलिसकर्मियों की जान खतरे में पड़ जाएगी।

...तो कौन संभालेगा गैंग की कमान

राहुल खट्टा और बिन्ते का एनकाउंटर हो गया। गैंग का लीडर राहुल खट्टा ही था। अब इस गैंग की कमान किसके हाथ में जाएगी। पुलिस अफसरों ने भी इस पर चर्चा शुरू कर दी है।

दरअसल, राहुल खट्टा के नाम से रजिस्टर्ड गैंग में 18 बदमाश वो हैं, जो पूर्व से कई वारदातों में राहुल खट्टा के साथ रहे। बाद में पुलिस ने 12 नाम और चिन्हित किए, लेकिन रजिस्टर्ड गैंग में उनका नाम शामिल नहीं किया गया।

राहुल खट्टा का सबसे करीबी बिन्ते के बाद आकाश जाट रहा। अपराध करने के दौरान भी इन दोनों बदमाशों की मौजूदगी रहती थी। वहीं ये बात भी पुलिस तक पहुंच रही थी कि आकाश जाट ने राहुल खट्टा से किनारा कर गैंग पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया है, जिसको लेकर आकाश और राहुल में वर्चस्व को लेकर विवाद हो गया है।

अब राहुल खट्टा और बिन्ते दोनों ही मारे गए, तो जाहिर कि आकाश जाट गैंग का नया लीडर बन सकता है। पुलिस अधिकारियों की मानें तो आकाश खुद को राहुल खट्टा से बड़ा बदमाश बनाना चाहता है। गैंग के अन्य साथियों को भी वह कहता है कि मेरे आगे राहुल क्या है। अब देखना ये है कि राहुल और बिन्ते की मौत से गैंग बिखरता है, या फिर से पुलिस के लिए मुश्किलें पैदा करेगा।

वेस्ट का डॉन बनना चाहता था खट्टा

कुख्यात बदमाश राहुल खट्टा वेस्ट यूपी का डॉन बनने की ख्वाहिश पाल बैठा था। उसमें अपराध के जरिए पैसा और शोहरत कमाने की इतनी ज्यादा हवस थी कि वह रंगदारी और फिरौती वसूलने में सबसे आगे निकल जाना चाहता था। वेस्ट यूपी के कारोबारियों और व्यापारियों से रंगदारी मांगने का मकसद भी यही था कि उसके नाम पर ज्यादा से ज्यादा इनाम हो। ऑपरेशन खट्टा से जुड़े एक अफसर की मानें तो कम समय में जरायम का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनने का नापाक मंसूबा उसे ले डूबा।

वेस्ट यूपी के जरायम में वह 90 का दशक था, जब महेंद्र फौजी, सतवीर गुर्जर, राजवीर रमाला, रविंद्र भूरा जैसे बड़े खिलाड़ियों की तूती बोलती थी। लेकिन, उस समय अपराध का व्यवसायीकरण नहीं था। यह चलन तो राहुल खट्टा और उसके समानांतर गैंगों ने शुरू किया। उस समय के गैंगों में सांप्रदायिक सौहार्द भी देखने को मिलता था।

90 के शुरुआती दशक में भी रंगदारी और किडनैप का पूरा जोर रहता था, लेकिन उस समय इससे ऊपर अपने गैंग का वर्चस्व कायम रखने का जुनून। उन बदमाशों को भी उस दौर में जातिगत आधार पर काफी मदद मिलती थी। लेकिन, पुलिस को उस समय भी सफलता दूसरे गैंगों से होने वाली मुखबिरी से मिलती थी।

इसके अगले दौर में पश्चिम के दो बड़े गैंगों ऊधम और योगेश भदौड़ा ने पैसों से ज्यादा प्रतिष्ठा के सवाल पर खून बहाया। इसके बाद राहुल खट्टा ने अपराध का ऐसा व्यवसायीकरण किया कि वह रंगदारी और फिरौती वसूलने के अलावा पुलिस पर भी इसलिए हमले करता था कि अपराध जगत में उसका बड़ा नाम हो और उसके नाम से ही लोग थर-थर कांपें।
विज्ञापन

भूरा और मुकीम के बाद आया रडार पर

सहारनपुर और आसपास ताबड़तोड़ वारदात कर सुर्खियों में आए मुकीम काला को दबोचने के लिए वेस्ट यूपी की पुलिस नए सिरे से जुटी थी। लेकिन, बागपत से अमित भूरा की फरारी के बाद पूरा फोकस मुकीम पर हो गया था। चार राज्यों की पुलिस उसे दबोचने में नाकाम रही और भूरा ने सेटिंग के साथ पटियाला में सरेंडर कर दिया। इसके बाद पुलिस का फोकस मुकीम पर आया तो कुछ कारणों से यह भटककर राहुल खट्टा की तरफ चला गया। ये कारण भी कुछ खास थे।

दरअसल, मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से 90 के उस दशक के गैंगों के सांप्रदायिक सौहार्द के समीकरण दरक गए थे। सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ और बागपत में जो भी बड़ा अपराध होता, उसमें मुकीम गैंग का नाम आता। लेकिन, पुलिस अफसरों के पास जो अंदरूनी सूचनाएं पहुंच रही थीं, उसमें बताया जा रहा था कि मुकीम से अलग कुछ वारदातें खट्टा गैंग कर रहा है।

खट्टा के हर बार बच निकलने की वजह भी खास थी, जो था उसका मुखबिर तंत्र। यह बदमाशों का नहीं, बल्कि खुद पुलिस का था। अधिकारी स्तर पर तो कुछ लीक नहीं होता था, लेकिन कुछ पुलिसकर्मी खट्टा के लिए मुखबिरी करते थे। खट्टा की घेरेबंदी के लिए किसी ऑपरेशनल कार्रवाई या प्लान की सूचना सबसे पहले खट्टा तक पहुंचती थी। इस सच्चाई को पुलिस के आला अफसर भी मान चुके थे। यही वजह रही कि मेरठ और बागपत में सक्रिय रहे खट्टा को पुलिस छू तक नहीं पाई। यह अपवाद ही रहा कि शुक्रवार को जब खट्टा मार गिराया गया तो मेरठ और बागपत के कुछ पुलिस कर्मियों को इस ऑपरेशन की हवा तक नहीं लगी।

खट्टा के मेरठ और बागपत के बाद सहारनपुर में कदम जमने शुरू हुए तो उसकी दूसरे मजबूत गैंगों ने पुलिस से मुखबिरी शुरू करा दी। यह गैंग भी कोई दूसरे नहीं, बल्कि मुकीम काला और उससे जुड़े हुए थे। दरअसल, खट्टा ने पिछले कुछ समय में सहारनपुर और शामली में ताबड़तोड़ अपराध किए। पुलिस ने शुरुआती जांच में इसमें मुकीम गैंग का हाथ माना। लेकिन, जब ूसरे गैंगों ने इसमें खट्टा का हाथ बताते हुए उसकी मुखबिरी शुरू कर दी। यही वजह थी कि खट्टा ने बागपत या मेरठ से सहारनपुर जाने के लिए मुजफ्फरनगर का रास्ता बदल लिया था। वह सहारनपुर जाने के लिए बड़ौत, कांधला, शामली, जलालाबाद और थानाभवन वाला रूट पकड़ता था।
और पढ़ें...
Next
AU ऐप में पढ़ें