दिल्ली में बिजली के दाम बढ़ाए जा चुके हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद पूरे देश के उपभोक्ताओं को बिजली बिल का तगड़ा झटका लग सकता है।
महंगाई की मार बिजली क्षेत्र पर भी पड़ी है। एक दशक में बिजली उत्पादन की लागत लगभग दोगुनी हो गई है। इस बढ़ी लागत का बोझ देर-सबेर उपभोक्ताओं पर पड़ना तय है।
केंद्र सरकार के विस्तारित विद्युत सुधार कार्यक्रम के बावजूद राज्यों का बिजली घाटा बरकरार है। काफी कोशिश के बाद बिजली घाटा घटकर औसतन 24 फीसदी तक पहुंचा है।
राज्य इस घाटे को ज्यादा दिन तक उठा पाने के लिए तैयार नहीं हैं। इन सबके बीच, कमरतोड़ महंगाई का असर बिजली क्षेत्र पर भी पड़ा है।
स्थिति यह है कि पिछले एक दशक में बिजली उत्पादन की लागत प्रति मेगावाट लगभग चार करोड़ रुपये बढ़ चुकी है। हाइड्रो से अब प्रति मेगावाट बिजली पैदा करने में औसत 7.50 करोड़ रुपये और थर्मल से 6.50 करोड़ रुपये की लागत आ रही है।
वर्ष 2001-02 के दौरान प्रति यूनिट बिजली की लागत 2.40 रुपये थी। कोयला और गैस के दामों में पहले ही भारी इजाफा हो चुका है। इनके अलावा ईंट, स्टील, सीमेंट जैसी निर्माण सामग्री के दाम आसमान छू रहे हैं। ढुलाई भी महंगी हो चुकी है।
यही वजह है कि पिछले दो साल के दौरान बिजली उत्पादन में लगभग एक करोड़ प्रति मेगावाट का इजाफा हो गया है। बिजली क्षेत्र के उपक्रम भी मानते हैं कि नई विद्युत परियोजनाओं से मिलने वाली बिजली पहले से ज्यादा महंगी है।
गरमी के मौसम में पीक आवर्स में कई बार 16 से 17 रुपये प्रति यूनिट बिजली बिकती रही है। वैसे भी दुनिया में बिजली की गुणवत्ता के मामले में भारत पिछली पंक्ति में है, जबकि महंगी बिजली वाले देशों में अग्रणी है। इसलिए यह तय है कि महंगाई का यह बोझ अब बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा।