नगमा अगर किसी फिल्म का प्रमोशन कर रही होती तो कहा जाता कि उनसे हो रही छेड़छाड़ फिल्म की मार्केट बढ़ाना का एक शगूफा है। वह आम पार्टी में भी नहीं है, जिसके नेताओं पर इन दिनों कई तरह से प्रहार झेल रहे हैं।
नगमा तो मेरठ से कांग्रेस के टिकट पर प्रत्याशी हैं। ऐसा भी नहीं कि वह अकेली हीरोइन हों जो कांग्रेस के लिए प्रचार कर रही हैं। नगमा के साथ साथ अमिषा पटेल, उदिता और दूसरी कई नायिकाएं प्रचार कर रही हैं। लेकिन मनचले छेड़खानी केवल नगमा के साथ कर रहे हैं।
ऐसा भी नहीं कि चुनाव में उतरने से पहले नगमा ने कोई बयान दे दिया हो। या कोई बात कह दी हो। बस मनचले उन्हें किसी न किसी बहाने तंग करते हैं।
समझ में नहीं आ रहा कुछ भी
मेरठ में तो चुनाव प्रचार करने में उनके साथ छेड़खानी करने की कोशिश की गई वह मोहम्मद कैफ के लिए वोट मांगने फूलपुर गईं तो वहां भी उन्हें यह दिक्कत झेलनी पड़ी।
उनकी समझ में यह नहीं आ रहा है कि तृणमूल कांग्रेस की मुनमुन सेन के समर्थन के लिए तो फिल्म जगत से जुड़ी उनकी दोनों बेटियां रिया और राइमा बांकुरा जम कर चुनाव प्रचार कर रही हैं, अमीषा भी खूब रोड शो कर रही है।
लेकिन कहीं कोई ऐसी घटना नहीं हुई लेकिन उनके साथ ऐसा बार बार क्यों हो रहा है। जबकि वह शालिनता से अपना और अपनी पार्टी के लिए प्रचार कर रही है।
मोदी पिचकारी, मोदी कचौरी
इसे इमेज ब्रांडिग का असर कहिए या दीवानगी। खंडवा की एक दुकान मोदी कचौरी बिक रही है। दुकानदान भी कहता है कि जबसे कचौरी का नाम मोदी रख दिया खूब ग्राहक आ रहे हैं।
नागपुर में आरएसएस का गढ़ होने के बावजूद भले भाजपा जीत के लिए तरस जाती हो, पर यहां के संतरे वालो ने संतरों पर मोदी का नाम लिखा है। यहां के संतरे दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। पर संतरे वालों ने कभी सेब की तरह उसकी खास प्रजाति की चिपकी नहीं लगाई।
कुछ इस तरह कि रंग और खुशबू ही पहचान है। लेकिन इन दिनों बाजारों में कई जगहों पर संतरों में कागज की सफेद सी पट्टी में लिखा मिलेगा, मोदी संतरे। कोई पूछता नहीं कि संतरों का मोदी लिखे होने का क्या मतलब है।
वैसे फाल्गुन में मोदी पिचकारी भी बाजारों में थी होली में इस बार शाहरुख पिचकारी, सलमान पिचकारी, करीना पिचकारी की जगह मोदी पिचकारी ज्यादा नजर आ रही थी। आम चुनाव का मौसम है तो यह सब नजर आएंगे ही।
एक नहीं तीन मोदी
सदाबहार अभिनेता देवानंद को यह पसंद नहीं था कि उनका हमशक्ल नजर आए। एक बार उनकी तरह तरह दिखने वाले एक देवानंद को उऩके घर पर आऩे में फटकार खानी पड़ी। देवानंद का मानना था कि उनकी अपनी शैली अंदाज है।
किसी दूसरे को उनकी नकल नहीं करनी चाहिए। उनकी तरह नहीं दिखना चाहिए। लेकिन फिल्म से हटकर राजनीति की बात हो तो शायद नेता इस बात पर फख्र महसूस करें कि उनकी इतनी लोकप्रियता है कि लोग उनकी तरह दिखना चाहते हैं। और कई लोग एकदम उनकी हमशक्ल बनकर घूम रहे हैं।
वैसे राजनीति में सुरक्षा के लिए लिहाज से भी ऐसे हमशक्ल की तलाश रहती है। कहा जाता है कि अमेरिका जैसे देश में वहां के राष्ट्रपति के हमशक्लों को कई बार कार के बेड़े में साथ साथ रखा जाता है।
यहां बात चुनावी फिजा की
लेकिन यहां बात चुनावी फिजा की है। इन दिनों मोदी से मिलती जुलती शक्ल वाले कुछ लोग खासे चर्चित है। लोग इन्हें देखकर खुश होते हैं।
इनमें दो नकली मोदी तो चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं। बड़ोदा के जीतू व्यास रिक्शा चालक हैं। लेकिन इन दिनों बड़ौदा की गलियों में मोदी के लिए वोट मांग रहे हैं। फिर भला बनारस के अभिनंदन पाठक पीछे क्यों रहे।
इस तरह दिखते हैं कि लोग एक बार अचरच में पड़ जाते हैं कि कहीं सचमुच मोदी तो नहीं आ गए। मुंबई के विकास मंहते भी मोदी की तरह नजर आते हैं। इस देश में अमिताभ कपिल देव और महेंद्र धोनी के हमशक्ल हो सकते हैं तो फिर नरेंद्र मोदी के क्यों नहीं। अभी तो तीन चार नरेंद्र मोदी नजर आए हैं। पर संख्या बढती ही जाएगी।
वो रहे ना वो हम रहे ना हम
अमर सिंह किसी क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हों और अमिताभ बच्चन की पत्नी जया बच्चन उनके विरोध में रोड शो कर रही हो, इस बात की पहले केवल कल्पना ही जा सकती थी। बड़े भइया और छोटे भइया के पाले बदल गए हैं।
वक्त ने क्या हसीं सितम किया कि वो रहे ना वो, हम रहे ना हम। बेशक अमिताभ बच्चन राजनीति से दूर हैं। लेकिन उनकी पत्नी जया बच्चन सपा की सांसद हैं। वह अपना फर्ज निभाने फतेहपुर सीकरी आईं और मुख्यमंत्री अखिलेश के साथ सपा प्रत्याशी के लिए वोट मांगे। चुनाव प्रचार में सामने के पाले में जया बच्चन को देखकर अमर सिंह के मन में न जाने क्या गुजरी होगी। पर यही राजनीति और समय का फेर है। कभी अमिताभ जहां नजर आते थे, उनसे दो कदम आगे या पीछे अमर सिंह जरूर दिखाई देते थे।
तब यही लगता था कि यह रिश्ता जन्म-जन्म का है। पर यह रिश्ता एक दशक का भी नहीं निभ पाया। वरना जया बच्चन कम से कम फतेहपुर सीकरी में साइकिल नहीं चला रही होती।
क्या करें खाने पड़ते हैं लड्डू रसगुल्ले
आम तौर पर खाने पीने को लेकर परहेज करने वाले नेता इन दिनों अपने को रोक नहीं पाते। खासकर प्रचार के समय कार्यकर्ताओं के आग्रह को वह ठुकरा नहीं पाते। उन्हें यह भी लगता है कि कहीं कार्यकर्ता नाराज न हो जाएं। या उन्हें बुरा न लग जाए। इसलिए प्लेट में जो भी मिठाई आती हैं उसे थोड़ा बहुत खाना पड़ता है।
राहुल गांधी पश्चिम बंगाल में पहुंचे तो वहां की मिठाई उनके सामने रखना लाजिमी था। एक प्लेट में बंगाली रसगुल्ले और संदेश दिया गया। पता नहीं इन दिनों उनका मिठाई खाने का मन है या नहीं, लेकिन मिठाई का एक पीस उन्होंने उठा लिया।
इतने में युवा कांग्रेसी खुश हो गए, नाच गाने लगे। उनकी खुशी इस तरह बरसी कि नाचते हुए एक कांग्रेसी उनसे गले लगने के लिए मचलने लगा। किसी तरह उसे अलग किया गया। राहुल ने वहां से आगे बढ़ना ठीक समझा।
थोड़ी मिठाई खानी पड़े तो क्या हर्ज
उधर रतलाम में रोड शो के लिए पहुंचे राज बब्बर ने मावा की टोकरियां ले जाते लोग देखे तो मावा खाने की फरमाइश की।
मावा खाना चाहते थे, या माहौल को सहज बनाना चाहते थे, यह तो वही जाने। लेकिन कांग्रेसी फटाफट उनके लिए मावा ले आए। थोड़ा मावा खाया।
मावे की गुणवत्ता की प्रशंसा की और फिर आगे निकल पड़े। वैसे कहा जाता है कि राज बब्बर मिठाई से परहेज करते हैं। लेकिन चुनाव प्रचार के समय थोड़ी मिठाई खानी पड़े तो क्या हर्ज है।