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हिमाचल चुनाव: आयोग का डंडा, बदला प्रचार का फंडा

Sat, 20 Oct 2012 07:37 AM IST
शिमला/ब्यूरो
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न पोस्टर, न बैनर, न वाहनों के काफिले। न लाउड स्पीकर का शोर और न ही इस्तहारों से पटी दीवारें। चुनावी मौसम में भी हिमाचल के लगभग सभी शहरों, कस्बों और गांवों की ऐसी ही तस्वीर है। प्रत्याशियों के साथ न समर्थकों की फौज दिखाई दे रही है और न ही नेताओं की सभाओं में पहले जैसी भीड़। चुनाव आयोग के डंडे ने इस बार प्रदेश में प्रचार का पूरा फंडा ही बदल दिया है।
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चुनावी खर्च की सीमा एवं आयोग की निगरानी के चलते प्रत्याशी और दलों के प्रचार का तरीका काफी हद तक बदल गया है। कांगड़ा, हमीरपुर, बिलासपुर से लेकर शिमला, ठियोग, जुब्बल-कोटखाई, रोहड़ू तक चुनावी बयार में भी सन्नाटा ही पसरा है।

चुनाव आयोग ने हर प्रत्याशी के लिए अधिकतम 11 लाख खर्च की सीमा तय की है। इसमें रैलियां, पोस्टर, वाहन एवं विज्ञापन समेत तमाम खर्च शामिल हैं। स्टार प्रचारक के खर्च को भी उम्मीदवार के खाते से जोड़ा गया है। चुनाव खर्च की निगरानी को उड़नदस्तों के साथ वीडियोग्राफी भी की जा रही है। ऐसे में पार्टियों और प्रत्याशियों के इस बार प्रचार के तरीके बदल गए हैं।
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पोस्टरों, बैनरों तथा वाहनों के काफिलों के जरिये अपने पक्ष में हवा बनाने के बजाय प्रत्याशी अब जन संपर्क को तरजीह दे रहे हैं। बदले माहौल में प्रत्याशियों के साथ समर्थकों की फौज के बजाय चंद कार्यकर्ता ही दिखाई दे रहे हैं। धूमल और वीरभद्र जैसे स्टार प्रचारकों को छोड़कर अन्य नेताओं की सभाओं में भी नाममात्र के लोग ही दिख रहे हैं।

देवभूमि में मतदाता खामोश
हिमाचल में मतदान को करीब पंद्रह दिन शेष बचे हैं। नामांकन के बाद प्रत्याशियों और पार्टियों ने प्रचार भी तेज कर दिया है, लेकिन मतदाता बिलकुल खामोश हैं। शहर, बाजार से लेकर गांवों में भी चुनाव को लेकर कोई खास चर्चा नहीं हो रही है।

फसल के काम पर जोर
हिमाचल में इन दिनों फसल का काम जोरों पर चल रहा है। धान और मक्की की कटाई हो रही है। ऐसे में प्रत्याशियों को दिन के समय घरों में लोग नहीं मिल रहे हैं। लिहाजा, सुबह-शाम ही प्रचार पर जोर है। त्योहार के मौसम के चलते भी लोग व्यस्त हैं।
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