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अंडाणु का दान करने से हुई महिला की मौत

Tue, 11 Mar 2014 07:36 PM IST
दिव्या आर्य/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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प्रमिला पांडे को तब ना ‘एग डोनेशन’ का मतलब पता था और ना ये मालूम था कि उनकी बेटी तीन बार ‘एग डोनेट’ कर चुकी है, जब उसकी मौत हो गई।
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मुंबई के साकीनाका इलाके की एक चाल में रहने वाली प्रमिला ख़ुद पांच बच्चों की मां हैं, पर एक महिला अपने शरीर में बनने वाले अंडाणु का दान यानी ‘एग डोनेशन’, भी कर सकती है, इससे वह बिल्कुल अनजान थीं। महिला के शरीर में अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु के मेल से गर्भाधान होता है।

ये सब तो तब सामने आया जब उनकी बेटी, सुषमा की मौत की जांच करने वाले मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कहा कि मौत, “एग डोनेशन से जुड़ी एक जटिलता की वजह से ही हुई है।”वह ये भी नहीं जानती थीं कि इस दान के लिए पैसे मिलते हैं और ये भी नहीं कि इस दान से मौत का ख़तरा भी हो सकता है।
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दोबारा केस की पड़ताल के आदेश

मुझसे बात करते हुए प्रमिला की आवाज़ में दुख से ज़्यादा गुस्सा था, “मैं तो चाहती हूं कि रोटुंडा अस्पताल का वह डॉक्टर भी उतना ही तड़पे, जितना मैं अपनी बेटी को याद कर तड़पती हूं, वह तो तब शादीशुदा भी नहीं थी, अनपढ़ थी। डॉक्टर को उसे समझाना चाहिए था, पूछना चाहिए था कि इतना बड़ा काम करने से पहले मां से पूछकर आई हो?”

मामला अदालत में होने की वजह से रोटुंडा अस्पताल ने बीबीसी से बात करने से इनकार कर दिया, पर अदालत को ये बयान ज़रूर दिया कि दान से पहले उन्होंने सुषमा को इस प्रक्रिया से होने वाली सभी समस्याओं के बारे में बताया था और उनकी लिखित सहमति भी ली गई थी।

सुषमा की मौत अगस्त 2010 में हुई थी। लंबी कार्रवाई के बाद अब अदालत ने मुंबई पुलिस से नाराज़गी जताते हुए दोबारा केस की पड़ताल करने के आदेश दिए हैं।

मौत का ख़तरा

भारत में ‘एग डोनेशन’ की प्रक्रिया पर दिशानिर्देश जारी करने वाले सरकारी संस्थान इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के मुताबिक इस प्रक्रिया से पैदा होने वाली मेडिकल जटिलताओं से क़रीब आठ प्रतिशत तक महिलाओं को मौत का ख़तरा होता है।

आम तौर पर एक महिला के शरीर में हर महीने एक या कभी-कभार दो अंडाणु बनते हैं। ‘एग डोनेशन’ के लिए महिला के शरीर में हॉर्मोन के इंजेक्शन लगाकर कई अंडाणु बनाए जाते हैं। फिर अंडाणुओं को महिला के शरीर से निकाल लिया जाता है। ये अंडाणु बाद में किसी ऐसी महिला को गर्भवती करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं जिसका शरीर अंडाणु बनाने में अक्षम हो।

इस प्रक्रिया को अंडाणुओं का दान कहा जाता है, लेकिन भारत समेत दुनिया भर में इसे पैसों के लिए किया जाना अब बहुत आम है। भारत में अंडाणुओं का एक बार दान करने के लिए महिला को क़रीब 15,000 रुपए दिए जाते हैं। अगर महिला पढ़ी-लिखी हो, अच्छे कॉलेज की डिग्री हो या नौकरीपेशा हो तो फ़ीस बढ़कर 50,000 से एक लाख रुपए तक हो सकती है।

‘एग डोनेशन’ के नियम

‘एग डोनेशन’ पर दिशा-निर्देश बनाने वाले आईसीएमआर के साइंटिस्ट, आर एस शर्मा ने बीबीसी से बातचीत में माना कि ये दान करने वाली महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा ग़रीब तबके का है और उन्हें इस प्रक्रिया की पेचीदगियों की जानकारी और समझ नहीं होती।

उन्होनें कहा, “ये एक बड़ी समस्या है कि कुछ क्लीनिक ‘एग डोनेशन’ से पहले अविवाहित लड़की के माता-पिता या विवाहित लड़की के पति की सहमति नहीं ले रहे, या फिर प्रक्रिया से पहले उससे पैदा होने वाली जटिलताओं के बारे में महिला को पूरी जानकारी नहीं दे रहे।”

भारत में अंडाणुओं के दान से पहले महिला की मां या पति से अनुमति लेने के लिए अस्पताल फ़िलहाल बाध्य नहीं हैं, पर डॉक्टर शर्मा ने बताया कि 2010 के विधेयक में ये प्रावधान रखा गया है। ‘एग डोनेशन’ समेत ‘इनफर्टिलिटी’ के सभी इलाजों को नियमित करने के लिए आईसीएमआर ने साल 2005 में दिशा-निर्देश और वर्ष 2010 में एक विधेयक बनाया था। विधेयक अब तक संसद के पटल तक नहीं पहुंचा है।

ग़रीबी से निकलने का रास्ता

क़ानून बनने में चाहे जितना समय लगे, पर अंडाणुओं का दान कर कुछ पैसे कमाने को इच्छुक महिलाएं और इन अंडाणुओं के ज़रिए अपना बच्चा पैदा करने की उम्मीद रखने वाले दम्पतियों की तादाद पिछले सालों में तेज़ी से बढ़ी है। साथ ही बढ़ रही है देने और लेने वालों को मिलाने वाले एजेंट्स की मांग। ‘इनफर्टिलिटी’ का इलाज तो क्लीनिक में ही होता है, पर दान देने वाली महिलाओं को इन क्लीनिक्स की जानकारी ज़्यादातर एजेंट्स के ज़रिए ही मिलती है। 30 साल की बबीता ने छह महीने पहले अंडाणुओं का दान किया जिसके लिए उन्हें 20,000 रुपए दिए गए थे। उन्होंने मुझे बताया, “सब पैसों के लिए ही करते हैं, मेरे तीन बच्चे हैं तो बस उनके ऊपर ही ख़र्च हो गया।”

पर ये तो सिर्फ शुरुआत थी, बबीता ने तय किया कि वह और औरतों को इस इलाज के बारे में बताएंगी और एजेंट के तौर पर उन्हें क्लीनिक तक ले जाने के क़रीब 5,000 रुपए के कमीशन को अपनी रोज़ी की ज़रिया बना लेंगी। बिहार के नालंदा की रहने वाली बबीता शादी के बाद दिल्ली में रहने लगीं थीं। पहले सिलाई का काम करती थीं तो क़रीब 6,000 रुपए कमाती थीं अब एजेंट बन गई हैं तो 40,000 रुपए तक एक महीने में मिल जाते हैं।

बबीता बताती हैं कि अब तो महिलाएं ढूंढनी भी नहीं पड़तीं, बस उनके मोबाइल नंबर पर फोन आ जाता है, “इसमें कुछ ग़लत तो है नहीं, ग़रीब की मदद हो जाती है, किसी को बच्चा करने की उम्मीद हो जाती है, और सिरदर्द या गैस के अलावा कोई परेशानी भी नहीं होती।” ‘एग डोनेशन’ से जुड़े मौत के ख़तरे से बबीता अनजान थीं।
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एग डोनर की बहुत मांग

गुड़गांव में वंश हेल्थ केयर चला रहे बजरंग सिंह के मुताबिक एजेंट्स में जानकारी का अभाव आम है, क्योंकि इनमें से ज़्यादातर कम पढ़ी-लिखी महिलाएँ होती हैं। वंश हेल्थ केयर में अंडाणुओं का दान करने वाली महिलाओं का चयन किया जाता है। महिलाओं के टेस्ट किए जाते हैं और ‘एग डोनेशन’ की प्रक्रिया की जानकारी और ख़तरे बताए जाते हैं। जब महिला और उसके पति की सहमति हो तो उन्हें अंडाणुओं की मांग कर रहे क्लीनिक्स के पास ले जाया जाता है जहां वे एग डोनेट करती हैं।

बजरंग बताते हैं कि पिछले दो सालों में गुड़गांव में एक से बढ़कर 10 एआरटी क्लीनिक हो गए हैं, “एग डोनर की बहुत मांग है और हम जानते हैं कि एजेंट के ज़रिए आई महिला कई बातों से अनजान होती है, इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी बन जाती है कि कम उम्र या ख़राब सेहत वाली महिलाओं को दान देने से रोका जाए।”

बजरंग के मुताबिक कई छोटे क्लीनिक्स में इन बातों का ध्यान नहीं रखा जाता और जब एक क्लीनिक आईसीएमआर के तय नियम को ज़ेहन में रखते हुए किसी महिला को लौटा देता है तो दूसरे क्लीनिक उन्हीं नियमों को नज़र अंदाज़ कर उस महिला से डोनेशन करवा लेते हैं। यानि दान करने वाली महिला से मां बनने की इच्छा रखने वाली महिला तक अंडाणुओं के पहुंचने के सफ़र में कई स्तर पर जानकारी दी जा सकती है और स्वास्थ्य का ख़्याल रखा जा सकता है, पर जब तक क़ानून के तहत कायदे तय नहीं हो जाते, महिलाओं के स्वास्थ्य को लगातार ख़तरा बना हुआ है।
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