कई केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान अपने धन को बैंकों में इस तरह से निवेश कर रहे हैं, जिससे उन्हें फायदा होने की बजाय नुकसान हो रहा है। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के मोती लाल नेहरू तकनीकी संस्थान, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद, पंजाब विश्वविद्यालय और झारखंड केंद्रीय विद्यालय ने करोड़ों की रकम इस तरह निवेश की जिससे नुकसान उठाना पड़ा है।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस मसले पर चुप्पी साध रखी है। नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) ने भी इसे लेकर सवाल उठाए हैं।
इलाहाबाद में मोतीलाल नेहरू तकनीकी संस्थान ने सात दिसंबर, 2011 को बैंक में अपने चालू खाते में 4.08 करोड़ रुपये छोड़ते हुए 20 सावधि जमा खातों में दस करोड़ की राशि का निवेश किया था।
20 अक्तूबर 2012 को सावधि जमा की तय अवधि खत्म होने के बाद मिली 11.07 करोड़ रुपये को चालू खाते में जमा करा दिया। जब खातों का ऑडिट किया गया तो सामने आया कि चालू खाते में 4.08 करोड़ होने के बावजूद 11.07 करोड़ की रकम को फिर से रखना न्यायसंगत नहीं था। इस रकम को एक साल और रखा गया।
कैग का कहना है कि ऐसा करने से एक करोड़ रुपये के ब्याज का नुकसान हुआ। मानव संसाधन मंत्रालय से सवाल किए जाने के बाद भी अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। नियमों के मुताबिक शिक्षण संस्थान को निवेश के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय से मंजूरी लेनी होती है।
इसी तरह अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद यानी एआईसीटी ने स्टेट बैंक में 217 करोड़ रुपये का निवेश सावधि जमा में अन्य बैंकों में दिए जाने वाले मौजूदा दरों का पता किए बगैर किया। इससे 3.25 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। पंजाब विश्वविद्यालय ने 2011 में सामान्य भविष्य निधि और अंशदान भविष्य निधि के अंशधारकों को ब्याज की उच्च दरें अदा की जिससे 4.49 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
मानव संसाधन मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देश है कि सरकार की ओर से अधिसूचित दर से अधिक दर पर ब्याज अदा नहीं किया जा सकता। मानव संसाधन विकास मंत्रालय को जून, 2013 को कैग ने चिट्ठी लिखी थी लेकिन मंत्रालय की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया है। झारखंड के केंद्रीय विश्वविद्यालय में भी ऐसा मामला सामना आया है।