आर्थिक गतिविधियां तेज होने के तमाम दावों के बीच अर्थव्यवस्था से नरेंद्र मोदी सरकार के लिए विचलित करने वाली खबर आई है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था की विकास दर घट गई है।
इस वर्ष अप्रैल से जून के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर सात फीसदी रही, जबकि इससे पहले वर्ष 2014-15 की अंतिम तिमाही में विकास दर 7.5 फीसदी थी।
हालांकि, ताजा आंकड़ों की यदि एक साल पहले की इसी अवधि से तुलना की जाए तो सरकार खुश हो सकती है क्योंकि उस दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.7 फीसदी रही थी। इन आंकड़ों को देखते हुए चालू वित्त वर्ष में 8.1 से 8.5 फीसदी के अनुमानित विकास दर लक्ष्य को पाना मुश्किल लग रहा है।
पहली तिमाही में घट गई अर्थव्यवस्था की रफ्तार
केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा इस वर्ष अप्रैल से जून की तिमाही के लिए जारी आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान कांस्टेंट मूल्य पर अर्थव्यवस्था 27.13 लाख करोड़ रुपये रही, जो कि पिछले साल की इसी अवधि के 25.35 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले सात फीसदी ज्यादा है।
इस दौरान मैन्यूफैक्चरिंग, कारोबार, होटल, ट्रांसपोर्ट, संचार सेवाओं में तो तेजी देखने को मिली, लेकिन इस अवधि में कृषि क्षेत्र सुस्ती का शिकार रहा।
इसके अलावा बिजली उत्पादन, गैस, जल आपूर्ति, यूटिलिटी सर्विसेज समेत कुछ क्षेत्रों ने निराश किया, जिससे एक तिमाही पहले के मुकाबले विकास दर आधा फीसदी घट गई।
अप्रैल से जून के बीच खनन क्षेत्र में भी गतिविधियां सुस्त रहीं। इस क्षेत्र में महज चार फीसदी की विकास दर दर्ज की गई जबकि एक साल पहले यह 4.3 फीसदी की दर से बढ़ी थी।
मोदी सरकार की स्थिति संतोषजनक नहीं
सीएसओ ने पिछले कुछ समय से आर्थिक गतिविधियों को मापने के लिए ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) कांसेप्ट पर काम शुरू किया था। इस तरीके में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है।
इस तिमाही में यह जहां 7.1 फीसदी रही जबकि एक साल पहले यह 7.4 फीसदी थी। आलोच्य अवधि के दौरान नॉमिनल जीडीपी में भी तेज गिरावट हुई है।
नॉमिनल जीडीपी एक वर्ष पहले 13.4 फीसदी पर थी, जो कि इस तिमाही में फिसल पर 8.8 फीसदी पर आ गई है। इस वर्ष की शुरुआत में सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए 8.1 से 8.5 फीसदी की विकास दर की भविष्यवाणी की थी, लेकिन यह लक्ष्य प्राप्त करना अब मुश्किल दिख रहा है।
रिसर्च फर्म क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी ने अर्थव्यवस्था के वृद्धि के आंकड़ों को असंतोषजनक बताया है। उनका कहना है कि अर्थव्यवस्था की विकास दर उम्मीद से कम रही है। ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक पर सितंबर में आने वाली मौद्रिक नीति में ब्याज दरों में कटौती का दबाव बढ़ गया है।