परिवार कल्याण विभाग के डिप्टी सीएमओ डॉ. वाईएस सचान की मौत को आत्महत्या मानते हुए सीबीआई ने शुक्रवार को केस की क्लोजर रिपोर्ट अदालत में दाखिल कर दी। सचान की मौत जेल अस्पताल में संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी, उन्हें एनआरएचएम घोटाले में गिरफ्तार किया गया था।
सीबीआई ने कारागार प्रशासन के तत्कालीन आईजी वीके गुप्ता समेत तीन जेल कर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की संस्तुति भी की है। सीबीआई के विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट नीलकांत मणि त्रिपाठी ने क्लोजर रिपोर्ट को दर्ज करते हुए 16 अक्तूबर को सुनवाई तय करने के साथ डॉ. सचान की पत्नी और वादी डॉ. मालती सचान को कोर्ट में तलब किया है।
सीबीआई की 120 पन्नों की क्लोजर रिपोर्ट में 111 गवाहों के बयान दर्ज हैं। डॉ. सचान की मृत्यु को आत्महत्या साबित करने के लिए रिपोर्ट में कुल 32 बिंदु दिए हैं। सीबीआई ने कहा है कि घटना वाले दिन 22 जून 2011 की सीसीटीवी फुटेज की जांच के मुताबिक उस दिन किसी संदिग्ध वाहन या व्यक्ति का आवागमन जेल में नहीं हुआ था। साथ ही जेल अस्पताल के आसपास लगभग 50 कर्मचारी, बंदी रक्षक व अस्पताल का स्टाफ भी मौजूद था। लिहाजा यह संभव नहीं है कि इतने लोगों की मौजूदगी में डॉक्टर को उसकी इच्छा के विपरीत प्रथम तल पर ले जाया गया और किसी ने देखा न हो।
जांच में पता चला कि डॉ. सचान ने मरने से पहले पानी पिया था। चिकित्सक होने की वजह से डॉ. सचान को धमनी की जानकारी थी और उन्होंने गले, कुहनी, बांह, कलाई व जांघ पर चोट पहुंचाई। पोस्टमार्टम व केंद्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. सचान के खून में कोई जहर या नशीली वस्तु नहीं पाई गई। उनके दाहिने हाथ की अंगुलियों पर जमा खून इशारा करता है कि मृतक ने ही खुद को चोट पहुंचाई। कलाई, कुहनी आदि पर पाए गए गहरे कट के निशान भी इसकी तस्दीक करते हैं। घटनास्थल पर मिले ब्लेड व बेल्ट का प्रयोग आत्महत्या के लिए किया गया है।
सीबीआई ने यह भी कहा है कि घटनास्थल पर किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की गई। मेडिकल बोर्ड एक्सपर्ट की रिपोर्ट से भी सीबीआई ने डॉ. योगेंद्र सिंह सचान की आत्महत्या का निष्कर्ष निकाला है। विवेचना में इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि 22 जून 2011 को जेल अस्पताल में डॉ. वाईएस सचान की मौत हो गई। घटना वाले दिन जेल शौचालय में किसी दूसरे व्यक्ति की मौजूदगी का प्रमाण नहीं मिला।
गवाहों के बयान, एम्स के डॉक्टरों के बोर्ड की रिपोर्ट, सेंट्रल फोरेंसिक लैब की रिपोर्ट, बॉयोलॉजिकल रिपोर्ट, फिंगर प्रिंट, साइकोलॉजिस्ट की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि डॉ. सचान ने आत्महत्या की है। एम्स के बोर्ड के अनुसार बताया गया कि डॉ. वाईएस सचान की मृत्यु लटकने से हुई और इसमें शरीर पर आई अन्य चोटें व रक्त स्राव भी कारक था। सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करते हुए कोर्ट से मांग की है कि रिपोर्ट में दिए गए तथ्यों के आधार पर डॉ. सचान की मृत्यु को आत्महत्या मानकर क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार कर ली जाए।
सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में साक्ष्यों की रक्षा न कर पाने और गंभीर प्रकरण में पूरी जिम्मेदारी से काम न करने का आरोपी ठहराते हुए तत्कालीन आईजी जेल वीके गुप्ता, हेड वार्डर पहींद्र सिंह व बाबू राम दुबे के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की है। सीबीआई ने कहा है कि आईजी ने डॉ. सचान के सुसाइड नोट को अपने कब्जे में लेने के बाद भी उसे सहेज कर नहीं रखा और इसकी सही जानकारी नहीं दी जबकि बाकी के जेलकर्मियों ने भी कई बातों को नहीं बताया और अनियमितता की।
सचान की आत्महत्या और सीबीआई की दलीलें
- जेल अस्पताल और जेल के मुख्य द्वारा के सीसीटीवी फुटेज से घटना के दिन 22 जून 2011 को किसी तरह की संदिग्ध गतिविधि नहीं दिखी।
- डॉक्टर होने के नाते सचान को मानव शरीर की संरचना की जानकारी थी और इसी वजह से महत्वपूर्ण स्थानों पर चोट पहुंचाई। चोटें गले, बांह, कुहनी, कलाई और जांघ के पास हैं जो आत्महत्या के मामलों में पाई जाती हैं।
- सभी चोटें मांसपेशियों तक पहुंची थी। इससे प्रतीत होता है कि चोट कुछ झिझक के साथ पहुंचाई गईं, जैसा की आत्महत्या के मामलों में पाया जाता है और कलाई व कुहनी पर पाई गई दोहरे कट के निशान से भी जाहिर होता है कि यह सेल्फ इंफ्लेक्टेड चोट है।
- डॉ. सचान ने पहले आधे ब्लेड से खुद को चोटें पहुंचा कर जान देने की कोशिश की पर धमनी या बड़ी नस के न कट पाने और खून का बहाव कम होने की वजह से उन्हें इस बात की आशंका हो गई होगी कि कहीं कोई उन्हें देख न ले और लोग उन्हें अस्पताल पहुंचा कर इलाज कराने लगें, इसी वजह से उन्होंने बेल्ट से अपना गला कस लिया।
- डॉ. सचान के दाहिने हाथ की अंगुलियों में जमे खून से पता चलता है कि उन्होंने खुद को चोट पहुंचाई। डॉ. सचान के शरीर पर बहे और रिसे खून व शौचालय में पाए गए खून के धब्बों से पता चलता है कि जिस दौरान डॉ. सचान ने खुद को चोट पहुंचाई वे वहां चल फिर रहे थे। शौचालय के वेंटीलेटर पर पाए गए निशान व खून के धब्बों से साबित होता है कि उन्होंने अपने ही हाथों से गले में बेल्ट का फंदा लगाया।
- मेडिकल बोर्ड व विशेषज्ञों की रिपोर्ट से जाहिर होता है कि सभी चोटों खुद को आत्महत्या के उद्देश्य से लगाई गई थीं।
- जिस समय घटना हुई, उस समय जेल अस्पताल में खासी चहलपहल थी और निचले तल पर घटना वाले शौचालय के नीचे 50 से 60 जेल कर्मचारी व कैदी मौजूद थे। अगर डॉ. सचान का कत्ल हुआ होता तो वे विरोध करते या चीखते पर किसी ने कुछ भी नहीं सुना।
- जिला कारागार और अस्पताल दोनों का ही 22 जून को एसीजेएम प्रीति श्रीवास्तव ने भी वहां निरीक्षण किया था पर कोई आपत्तिजनक बात नहीं पाई।
- 22 जून 2011 को डॉ. सचान की लाश रात साढ़े आठ बजे बरामद हुई और उनके सामान से सुसाइड नोट भी बरामद हुआ था, जिसमें डॉ. सचान ने मीडिया से खुद को निर्दोष बताया था। इसी नोट को आईजी कारागार वीके गुप्ता ने हटा दी और बाद में फोटोकापी मुहैया करा दी। सीबीआई ने कहा है कि हस्तलेख विशेषज्ञ ने भी नोट में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं पाई।