दो संस्कृतियों का मेल होता है तो दोनों एक-दूसरे पर अपनी छाप छोड़ती हैं। मैदानी भागों की संस्कृति जब पहाड़ चढ़ी तो उत्तरकाशी के यमुना और टौंसघाटी क्षेत्र में दो-दो दिवाली मनाई जाने लगी। कार्तिक की दिवाली यहां का पारंपरिक त्योहार नहीं है।
कार्तिक दिवाली के साथ ही यहां पटाखों, आतिशबाजी का भी चलन बढ़ा है, जिसे क्षेत्र के लोग यहां के माहौल के लिहाज से मुफीद नहीं मानते। लकड़ी के मकान आतिशबाजी के मद्देनजर बेहद संवेदनशील हैं। पंचगांई क्षेत्र में पंचायतों ने दीपावली की रात गांव के भीतर पटाखे जलाने, बीड़ी-सिगरेट पीने, लैंप लालटेन बाहर लाने, आग जलाने पर प्रतिबंध लगा रखा है। गांव के बाहर निर्धारित सुरक्षित प्लाट में ही दिवाली की रस्म पूरी की जाती है।
बूढ़ी दिवाली मनाने का था प्रचलन
यमुना टौंस घाटी के मेले त्योहारों पर शोध करने वाले डा.प्रह्लाद सिंह रावत कहते हैं कि इस क्षेत्र के त्योहारों में मंगसीर (मार्गशीष) की बूढ़ी दिवाली शामिल है। कार्तिक की दीवाली का प्रचलन कुछ दशक पहले हुआ। तभी तो यहां के लोग इसे नई दिवाली कहते हैं। राहुल सांकृत्यायन के साहित्य में भी यहां मंगसीर की बूढ़ी दीपावली का ही वर्णन मिलता है।
आतिशबाजी से वन्य जीव होते हैं असहज
गोविंद पशु विहार के उपनिदेशक जीएन यादव कहते हैं कि पशु विहार व नेशनल पार्क की नोटिफाइड सीमा के भीतर आतिशबाजी अपराध की श्रेणी में आती है। वैसे इस क्षेत्र में पड़ने वाले 42 गांवों के जंगल से लगे खेतों के बाहर हमारे 125 वर्ग किमी नोटिफाइड एरिया की सीमा शुरू होती है। नजदीक में पटाखों के धमाकों से वन्य जीव असहज हो जाते हैं। किंतु अभी इस क्षेत्र में आतिशबाजी का प्रचलन कम ही है।
ऐसे मनाई जाती है बूढ़ी दिवाली
कार्तिक की दिवाली के ठीक एक माह बाद उत्तरकाशी के अधिकांश हिस्सों में मंगसीर या बूढ़ी दीपावली मनाने की परंपरा है। इस दौरान लोग खेती के काम से निबट कर खाली रहते हैं। तीन दिनों तक चलने वाली इस दिवाली में घरों की सफाई, पकवान तैयार करना, देर रात तक पंचायती चौक में अलाव जलाकर ढोल की थाप पर नाच-गाना, गांव से बाहर देवदार का हरा पेड़ काटकर उस पर सूखी झाड़ियां बांध कर डायन के प्रतीक रूप में जलती मशाल से इसका दहन किया जाता है। इसके अलावा 20 मीटर बाबड घास से तैयार रस्सी से रस्साकसी, हरिण नृत्य आदि कार्यक्रम होते हैं।