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जानें 'विदर्भ' बनने से कैसे बचा देवास?

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कहते हैं कि 'बिन पानी, सब सून' और खेती, वो तो मुमकिन ही नहीं। समस्या केवल पेय जल को लेकर ही नहीं बल्कि सिंचाई को लेकर भी है।
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कम ही लोग ये समझ पा रहे हैं कि भूजल कोई असीमित संसाधन नहीं है कि यह हमेशा बना रहेगा। सवाल ये भी है कि हम धरती से पानी ले तो रहे हैं लेकिन उसे वापस क्या दे रहे हैं।

लेकिन देवास के लोगों ने ये समझा कि पोखर-तालाब और बावड़ी धरती को पानी लौटाने का ही एक जरिया होता है। देवास के कुल 1,067 गांवों में से आधे से भी कम गांवों में आज 10 हजार से ज्यादा तालाब बनाए जा चुके हैं।
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मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के देवास को कभी 'डार्क ज़ोन' (जहां भूजल खत्म हो चुका हो) घोषित कर दिया गया था और हालात कुछ ऐसे बने कि वहां पीने का पानी रेलगाड़ियों से लाया जाने लगा था।

यह सिलसिला लगभग डेढ़ दशक तक चला लेकिन 2005 के बाद से यहां तालाब की परंपरा को ज़िंदा करने का अभियान शुरू किया गया।

उमाकांत उमराव का है बड़ा रोल

साल 2005 में यहां आयुक्त के तौर पर उमाकांत उमराव की तैनाती हुई और उन्होंने देखा कि गांवों में भी ट्यूबवेल के ज़रिए खेतों को सींचने के लिए 350-400 फीट खुदाई की जा रही है और तब भी पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है।

इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के उमराव ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और एक साल और पांच महीने की तैनाती के दौरान ही उन्होंने सैकड़ों तालाब किसानों के साथ मिलकर बना डाले।

नतीजा यह हुआ कि देवास के गांवों में आज हज़ारों की संख्या में तालाब बनाए जा चुके हैं। अब यहां के किसानों को अपना खेत सींचने के लिए मानसून का इंतज़ार नहीं करना पड़ता।

टोंक कलां गांव के 76 वर्ष के किसान प्रेम सिंह खिंची कहते हैं, "यहां पानी के संकट की वजह से पशु-पक्षी नदारद हो गए थे लेकिन अब तालाब बनाए जाने की वजह से पक्षियों की कई प्रजातियां बड़ी संख्या में दिखने लगी हैं।"

'दूसरा विदर्भ बनने वाला था देवास'

2006 से पहले यहां की सिर्फ 30 फीसदी खेती सिंचिंत थी लेकिन अब 100 फीसदी खेत सिंचिंत है। यही वजह है कि एक फसल के बजाय यहां के किसानों ने तीन-चार फसलें उगानी शुरू कर दी है।

खेती से जुड़े दूसरे पेशों में मसलन वेयरहाउस (अनाज गोदाम) और बीज बेचने जैसे धंधों में किसानों ने अपने हाथ अजमाने शुरू कर दिए।

और अब आलम यह है कि कुछ बड़े किसानों का टर्न ओवर 18-20 करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच चुका है जबकि छोटी जोत के किसान भी कुछ लाख रुपये तो साल के बचा ही लेते हैं।

उमाकांत उमराव फिलहाल आदिवासी विकास के आयुक्त हैं और वह बताते हैं, "मैंने पाया कि यहां 100 बिगहा रकबा वाले किसान कर्ज़ में डूब चुके थे और यह देश का दूसरा विदर्भ बनने जा रहा था।"

पाताल पहुंच गया था भूजल स्तर

उन्होंने बताया, "मैंने किसानों को सरकारी नारों 'जल बचाओ, जीवन बचाओ' से मुक्त करके उन्हें 'जल बचाओ, लाभ कमाओ' के सपने दिखाए। 'खेत का पानी खेत में, खेत की मिट्टी खेत में' जैसे नारे गढ़े गए।"

"उन्हें यह बात समझ में आई कि कुल रकबे के 10 फीसदी में तालाब बनाया जाए तो खेती से आर्थिक लाभ कम-से-कम पांच गुणा बढ़ जाएगा।"

मालवा में तालाब, गढ़री और कुएं की संस्कृति बहुत पुराने समय से रही है लेकिन पिछले तीन-चार दशकों में तालाबों में मिट्टी डालकर इन्हें बेचने का और इसपर मकान और कारखाने खड़ा करने का रिवाज चल पड़ा था। नतीजा यह हुआ कि देवास शहर और इस ज़िले के गांवों के पेट में पानी ही नहीं बचा।

1960-70 के दशक में पश्चिम से उधार ली गई ट्यूबवेल की तकनीक का पूरे देश में जोरदार तरीके से प्रचार-प्रसार हुआ और तीन-चार दशकों में देश के अन्य इलाकों की तरह यहां का भूजल स्तर पाताल पहुंच गया था।
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कर्ज के दलदल में फंसे थे किसान

ट्यूबवेल और नलकूप खोदने के लिए सरकार ने बड़े पैमाने पर कर्ज और सुविधाएं उपलब्ध कराई। देवास भी इससे अछूता नहीं रहा है और मालवा की प्राचीन तालाब संस्कृति को छोड़ सभी ट्यूबवेल से खेतों को सींचने लगे और यहां कुछ गांवों में तो 500-1000 नलकूप खोद दिए हैं।

इंडिया वाटर पोर्टल (हिंदी) के संयोजक सिराज केसर बताते हैं, "देवास जिले के इस्माइल खेड़ी गांव में नलकूपों की संख्या लगभग 1000 के करीब है। 60-70 फुट पर मिलने वाला पानी 300-400 फुट के करीब पहुंच गया।"

"पानी के लिए बहुत गहरे तक उतरने के बाद पानी में भारी तत्व बाहर आने लगा जिसके चलते खेतों की मिट्टी बेकार साबित होने लगी थी।"

2000 तक आते-आते गहरे से गहरे खोदने की मजबूरी ने नलकूप खुदाई को और मंहगा कर दिया। किसान कर्ज के दलदल में फंसते चले गए। कभी चड़स और रहट से सिंचाई करने वाला देवास का किसान नलकूपों के बोझ से लदता गया।

यहां से पलायन भी होने लगा था लेकिन तालाब संस्कृति के जिंदा होने के बाद अब यहां के लड़के इंदौर और उज्जैन से एमबीए, इंजीनियरिंग और फ़ार्मा की डिग्री लेकर खेतों की ओर लौट रहे हैं और खेती उनके लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है।
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