दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा के स्थानीय दिग्गज नेताओं की भूमिका महज निर्देशों का पालन करने वाले रोबो की तरह रही। रणनीति बनाने के लिए न तो पार्टी नेतृत्व ने इन नेताओं की सलाह लेना जरूरी समझा और न ही इन नेताओं ने आगे बढ़कर आलाकमान को सुझाव दिया।
इन नेताओं की भूमिका महज चुनाव अभियान समिति का निर्देश मानने तक सीमित कर दी गई थी। इनमें से किसी को प्रतिदिन प्रदेश मुख्यालय में निश्चित अवधि तक उपस्थित रहने की हिदायत दी गई, तो किसी को सीएम पद की प्रत्याशी किरण बेदी के साथ खड़े रहने की।
इस सब के इतर रणनीति बनाने की बाहरी नेताओं को मिली खुली छूट ने इन नेताओं का जायका खराब कर दिया था। यही कारण है कि इन नेताओं ने कार्यकर्ताओं में जारी असंतोष सहित अन्य मामलों में खुद को हस्तक्षेप से दूर रखा।
बाहरी नेताओं को मिली खुली छूट ने बिगाड़ा जायका
यह प्रबंधन से जुड़े बाहरी नेताओं का ही कमाल था कि कम टिकट मिलने से नाराज पूर्वांचल के मतदाताओं को मनाने के लिए किसी ने न तो सांसद मनोज तिवारी की मदद ली और न ही पहाड़ी मतदाताओं को मनाने के लिए उत्तराखंड के दिग्गज नेताओं को ही मैदान में उतारा।
स्थानीय नेता मानते हैं कि अगर चुनाव नतीजे प्रतिकूल आए तो इसके लिए चुनाव प्रबंधन संभाल रहे नेताओं की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा होगी। कभी पार्टी में सीएम पद के उम्मीदवार रहे एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि इस बार के चुनाव में नेतृत्व ने उनकी भूमिका प्रदेश दफ्तर में प्रतिदिन छह घंटे की उपस्थिति दर्ज कराने की थी।
वह दो हफ्ते से लगातार दफ्तर आ रहे हैं, मगर उनसे किसी तरह की रणनीतिक सलाह नहीं ली गई। इसी प्रकार बीते विधानसभा चुनाव में सीएम उम्मीदवार बनाए गए हर्षवर्द्धन का ज्यादातर समय बेदी के साथ रोड शो और रैलियों में गुजरा।
भाजपा को उठाना पड़ सकता है इसका नुकसान
कुछ सांसदों से रैलियां और नुक्कड़ सभाएं कराई तो गई, मगर इनसे भी रणनीति के स्तर पर सलाह नहीं ली गई। उक्त नेता के मुताबिक प्रचार प्रबंधन में चूंकि बाहरी नेताओं को लगाया गया था, इसलिए इससे जुड़े नेता कई बार जमीनी हकीकत नहीं भांप पाए।
जमीनी हकीकत न भांप पाने के कारण हालात संभालने के लिए स्थानीय नेताओं का बेहतर उपयोग नहीं हो पाया। उल्लेखनीय है कि पार्टी ने बीते विधानसभा चुनावों से लेकर लोकसभा चुनाव तक पूर्वांचल और पहाड़ी मतदाताओं को लुभाने के लिए इन राज्यों से जुड़े कद्दावर नेताओं का व्यापक इस्तेमाल करती रही है।
प्रबंध तंत्र ऐसा था कि बेदी की उम्मीदवारी पर नाराजगी जताने वाले सांसद मनोज तिवारी तक का बेहतर उपयोग नहीं हो पाया, जबकि उनकी पूर्वांचल के मतदाताओं में अच्छी पकड़ थी। इसी प्रकार इस चुनाव में उत्तराखंड के दिग्गज नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्रियों भुवनचंद खंडूरी, भगत सिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल निशंक की भी सेवा नहीं ली गई।