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इंटरनेट पर गुंडाराज, लाचार हुई सरकार

Mon, 29 Apr 2013 12:48 AM IST
धीरज कनोजिया/नई दिल्ली
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रोजमर्रा की जिंदगी में तो हम खराब कानून व्यवस्था से जूझ ही रहे हैं, लेकिन जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके कंप्यूटर भी हम सुरक्षित नहीं हैं।
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कमजोर साइबर कानून के चलते अब हमें इंटरनेट पर भी ‘गुंडाराज’ का सामना करना पड़ रहा है।

सरकार की लाचारी से यह समस्या और भी विकराल रूप लेती जा रही है। यही वजह है कि इंटरनेट पर आए दिन हमें गुंडागर्दी, धोखाधड़ी जैसे मामले सुनने को मिलते रहते हैं।

विभिन्न राज्यों के पुलिस थानों में इंटरनेट के जरिए ब्लैकमेलिंग, युवतियों की निजता का उल्लंघन और रुपये-पैसे की धोखाधड़ी के मामलों की भरमार लग गई हैं।

मगर देश की सूचना तकनीक कानून में ऐसे सख्त प्रावधान ही नहीं है, जोकि साइबर दबंगई के मारों को न्याय दिला सके।

यही नहीं, पुलिस कर्मी भी इस तरह के अपराधों की जांच करने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं। वे आम अपराध की तरह इससे निपटते हैं।

सूचना तकनीक विशेषज्ञ पवन दुग्गल ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि कानून को और सख्त बनाने की जरूरत है।

साइबर बुलिंग के मामलों में कम से कम पांच साल की जेल और 10 लाख रुपये का जुर्माना ठोकने जैसे कड़े प्रावधान शामिल करने की जरूरत है।

अभी सिर्फ तीन साल की सजा और डेढ़ लाख के जुर्माने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि ज्यादातर देखा गया है कि पीड़ितों के करीबी इस तरह के काम को अंजाम देते हैं।
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इसलिए इंटरनेट यूजर्स को सर्फिंग करते वक्त अपनी पहचान को पूरी तरह से गुप्त और सुरक्षित रखना चाहिए। उनको अपने पासवर्ड और अपनी पहचान छिपा कर रखनी चाहिए।

वहीं अभिभावकों को भी इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले अपने बच्चों पर नजर रखनी चाहिए। साथ ही अपने बच्चों को साइबर अपराध के खतरों से भी पूरी तरह अवगत भी कराना चाहिए।

इंटरनेट पर साइबर अपराधों के पीड़ितों के दिमाग में यह बात भी होती है कि वह इन मामलों की पुलिस में रिपोर्ट करेंगे तो उनको अनावश्यक तौर पर परेशानी झेलनी पड़ेगी।

साइबर विशेषज्ञ कहते हैं कि लोगों की इस मानसिकता के पीछे काफी हद तक पुलिस भी जिम्मेदार है, क्योंकि ज्यादातर पुलिसकर्मी इस तरह के मामलों को निपटने के लिए पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं हैं।

दंतहीन है साइबर कानून
साइबर अपराध के लिए देश के एकमात्र आईटी कानून को काफी कमजोर कानून कर दिया गया है। आईटी अधिनियिम में 2008 में संशोधन के बाद सिर्फ तीन मसलों को छोड़कर सभी तरह के साइबर अपराधों को जमानती बना दिया गया। जबकि 2002 के मूल कानून में ज्यादातर अपराध गैर जमानती थे।

अब सिर्फ साइबर आतंकवाद, बच्चों की पोर्नोग्राफी और निजता का उल्लंघन जैसे तीन मसले ही गैर जमानती अपराध की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में साइबर अपराध से जुड़े मामलों में अभियुक्तों को जमानत मिल जाती है और वह जमानत पर छूटने के बाद इलेक्ट्रानिक सबूत को नष्ट कर देते हैं।
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सिर्फ तीन मामलों में सजा
पुलिस की लचर जांच का ही सबसे बड़ा सबूत है कि देश में 1995 में इंटरनेट आने के बाद से अब तक लगभग सिर्फ तीन साइबर अपराध के मुकदमों में ही सजा हो पाई है।

2010 में सिर्फ एक हजार मामले हुए दर्ज
पुलिस की कोताही का सबसे बड़ा नमूना तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी पेश करते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक 2010 में पूरे देश में सिर्फ हजार के करीब साइबर अपराध दर्ज किए गए हैं। जबकि अखबारों में रोजाना इस तरह के मामलों की रिपोर्टिंग देखी जा सकती हैं।
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