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गिरे कच्चे तेल के दाम, फिर भी महंगा पेट्रोल क्यों?

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अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय बॉस्केट के कच्चे तेल की कीमत 12 जनवरी को 45.86 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत पेट्रोलियम नियोजन और विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी) की सूचना के अनुसार भारतीय बॉस्केट के लिए कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमत घटकर 45.86  अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रही। 9 जनवरी को यह कीमत 47.36 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थी।
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रुपए के संदर्भ में कच्चे तेल की कीमत 12 जनवरी को घटकर 2850.66 रुपए प्रति बैरल हो गई, जबकि 9 जनवरी को 2955.26 रुपये प्रति बैरल थी।
 
12 जनवरी को रुपया मजबूती के साथ 62.16 रुपए प्रति अमेरिकी डॉलर पर बंद हुआ। 9 जनवरी को यह कीमत 62.40 रुपए प्रति अमेरिकी डॉलर थी।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत इतनी कम होने के बावजूद डीजल-पेट्रोल की कीमत भारत में कम नहीं हो पा रही है। केंद्र सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों को क्यों नहीं कम रही है? वहीं केंद्र अभी तक तीन बार कच्चे तेल के आयात पर उत्पाद शुल्क बढ़ाकर लोगों को असली फायदा लेने से रोक रही है।

फरवरी 2007 में कच्चे तेल की कीमत 55 डॉलर के स्तर पर थी। तब भारत में पेट्रोल 42 रुपए और डीजल 30 रुपए प्रति लीटर की कीमत पर बिक रहा था। पर आज 45.86 डॉलर प्रति बैरल क्रूड ऑयल होने के बावजूद पेट्रोल और डीजल की कीमत कम नहीं हुई है। अभी भी पेट्रोल 61 और डीजल 51 रुपए प्रति लीटर की दर से आम ग्राहकों को मिल रहा है।
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जनता क्यों नहीं पा रही फायदा?

गौरतलब है कि सरकार को सीधे तौर पर फायदा हो रहा है। पर इसका फायदा जनता को नहीं मिल रहा है। वित्‍त वर्ष 2014-15 के छह महीनों के लिए अंडर-रिकवरी 51,110 करोड़ रूपए रही है। वित्त वर्ष 2013-14 के पूरे वर्ष के लिए यह राशि 1,39,869 करोड़ रूपये रही थी।

भारतीय बॉस्‍केट के कच्‍चे तेल की अंतर्राष्‍ट्रीय कीमत 31 दिसंबर को 53.53 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थी, जबकि 30 दिसंबर, 2014 को यह 53.81 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल थी। रुपये के संदर्भ में कच्‍चे तेल की कीमत 31 दिसंबर, 2014 को घटकर 3390.05 रुपये प्रति बैरल हो गई जबकि 30 दिसंबर, 2014 को यह 3430.39 रुपये प्रति बैरल थी। रुपया 31 दिसंबर, 2014 को रुपया मजबूत होकर 63.33 रुपये प्रति अमेरीकी डॉलर पर बन्‍द हुआ, जबकि 30 दिसंबर, 2014 को 63.75 रुपये प्रति अमे‌रिकी डॉलर था।

जून 2014 और जुलाई 2014 के बीच में ब्रैंट क्रूड (ऑयल) की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर थी। पर धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत कम होने लगी।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत कम होने की वजह अमेरिका, यूरोप और चीन में ब्रैंट क्रूड की मांग में कमी आना था। अमेरिका, चीन और यूरोप के देशों ने अपने यहां ही क्रूड ऑयल का उत्पादन शुरू कर दिया।

जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए वर्ष 2005 तक 60 फीसदी क्रूड ऑयल का आयात करता था। वर्ष 2013 तक अमेरिका ने यह आयात घटाकर 35 फीसदी कर दिया है।

करीब 60 फीसदी सस्ता हुआ कच्चा तेल

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ब्रैंट क्रूड की कीमत 1 अगस्‍त 2014 को 103.45 डॉलर प्रति बैरल थी। 22 अगस्त को यह कीमत घटकर 100.99 डॉलर प्रति बैरल हो गई।

अक्टूबर 2014 में ब्रैंट क्रूड की कीमत 88.66 डॉलर, 3 नवंबर को यह कीमत 84.9 डॉलर, 27 नवंबर को 72.68 डॉलर और 28 नवंबर को यह कीमत घटकर 72.58 डॉलर प्रति बैरल हो गई। एक बैरल में 158.98 लीटर तेल होता है। वर्ष 2013-14 के आकड़ों के मुताबिक भारत प्रति दिन 385,000 बैरल तेल का आयात करता है।

तेल की मांग कम होने के बावजूद ओपेक देशों ने यह फैसला किया है कि वह तेल का उत्पादन नहीं घटाएंगे। तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कम होने से भारत मे थोक महंगाई दर से खुदरा महंगाई दर में कमी देखने को मिली है। अंतर्राष्ट्रीय जगत में तेल की कीमत कम होने के चलते भारत की तेल विपणन कंपनियों को घाटा भी कम हु‌आ है।

मई 2014 में जहां भारत की तेल विपणन कंपनियों का घाटा 318 करोड़ रुपए था। नवंबर 2014 में वह घटकर 188 करोड़ रुपए के स्तर पर आ गया है। आपको बताते चले कि केंद्र सरकार ने अपने बजट 2014-15 में ऑयल सब्सिडी पर 63,427 करोड़ रुपए का आवंटन किया है। आने वाले समय में इसका फायदा भी सरकार को मिलेगा। क्योंकि तेल की कीमत कम होने से सरकार को सब्सिडी में बचत होगी।

40 डॉलर के नीचे जा सकती हैं कीमतें

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तलहटी की ओर हैं। इस साल जून महीने से लेकर अब तक तेल की कीमतें 60 फीसदी गिर कर 46 डॉलर से भी नीचे पहुंच गई हैं।

अभी और गिरावट के आसार है और ये 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। वर्ष 2009 की मंदी के बाद तेल की कीमतों में यह सबसे बड़ी गिरावट है। कच्चे तेल के रुझानों के विश्लेषकों का मानना है तेल की कीमतें गिर कर 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

बाजार में तेल की कीमतों में इस गिरावट के पीछे कोई पेचीदा वजह नहीं है। बाजार में मांग से ज्यादा आपूर्ति ने ही तेल कीमतों को धराशायी किया है। सबसे ज्यादा असर अमेरिका में घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी का पड़ा है।

पिछले छह साल में यहां उत्पादन में दोगुना बढ़ोतरी हुई है। अमेरिका तेल खपत करने वाले दुनिया के बड़े देशों में से एक है। लेकिन यहां उत्पादन बढ़ने से इसका तेल आयात घट गया है। लिहाजा इसे तेल सप्लाई करने वाले सऊदी अरब, नाइजीरिया और अल्जीरिया अब एशियाई बाजारों में कम कीमत पर तेल बेच रहे हैं। अमेरिका, यूरोपीय और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में गिरावट की वजह से भी तेल की मांग कम हुई है।

तेल कीमतों में इस गिरावट को देखते हुए ईरान, वेनेजुएला और अलजीरिया तेल निर्यात करने वाले देशों के संगठन ओपेक  के अन्य सदस्य देशों से उत्पादन घटाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और दूसरे खाड़ी देश उत्पादन घटाने से इनकार कर रहे हैं। इराक भी अपना उत्पादन बढ़ाए हुए है।

तेज गिरावट के पीछे कोई साजिश है?

क्या तेल कीमतों में इस तेज गिरावट के पीछे कोई साजिश है? बड़ी तेल कंपनियों के कुछ अधिकारी गुपचुप तरीके से कहते हैं कि तेल उत्पादन बढ़ा कर सऊदी अरब, रूस और ईरान को नुकसान पहुंचाना चाहता है।

अमेरिका भी उत्पादन बढ़ा कर रूस और ईरान को सबक सिखा रहा है। हालांकि इस तर्क में ज्यादा दम नहीं दिखता। सऊदी अरब और अमेरिका की जुगलबंदी शायद ही दिखी हैसऊदी अरब का कहना है कि अगर वह उत्पादन कम करेगा तो उसके प्रतिद्वंद्वियों को फायदा होगा। सऊदी अरब चाहता है कि कीमतें बढ़नी चाहिए लेकिन उसकी सदिच्छा पर विश्वास करना मुश्किल है।
 
तेल कीमतों में इस गिरावट का फायदा सबसे ज्यादा उपभोक्ताओं को मिला है। अगले कुछ सालों में तेल इस्तेमाल करने वाले हर परिवार को औसतन 1000 डॉलर का फायदा मिल सकता है।

तेल कीमतों में इस गिरावट से वेनेजुएला, ईरान, इक्वेडोर, ब्राजील और रूस को सबसे ज्यादा घाटा होगा और उन्हें राजनीतिक उथल-पुथल का भी सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका में भी कुछ तेल कंपनियों को नुकसान हो सकता है और वे धंधे से बाहर हो सकती हैं।

अब अहम सवाल यह है कि क्या तेल कीमतों में फिर उछाल देखने को मिलेगा। निकट भविष्य में ऐसा नहीं दिखता। अमेरिका और कुछ अन्य देशों में तेल का उत्पादन बढ़ा हुआ है।

ज्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले कुछ महीनों में कच्चे तेल की कीमतें गिर कर 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। हालांकि कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि दूसरी छमाही में उत्पादन गिरने की संभावना है। इसके बाद ही तेल कीमतों में बढ़ोतरी की कोई संभावना पैदा होगी। अगर ऐसा होता हैतो यह तेल उद्योग के उतार-चढ़ाव की कहानी को दोहराने जैसा ही होगा।
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आप खुद ही तय करें

हम आपको एक ऐसी लिस्ट उपलब्‍ध करा रहे हैं। पिछले सालों में कच्चे तेल के दाम किस समय किस स्तर पर थे। इसके अनुसार आप खुद ही तय कर सकते हैं कि आप को आज कितना सस्ता पेट्रोल और डीजल मिलना चाहिए।

दिनांक--------------क्रूड(बैरल/प्रति डॉलर)--पेट्रोल रूपए प्रति लीटर डीजल रूपए प्रति लीटर
जुलाई-------01 2009-------69.12-------44.63-------------------32.87
जनवरी-------28 2009-------44.12-------40.62-------------------30.86
दिसंबर-------05 2008-------43.56-------45.62-------------------32.86
जुलाई-------16 2008-------132.47-------50.62-------------------34.86
जून-------04 2008-------113.00-------50.56-------------------34.80
फरवरी-------14 2008-------90.88-------45.52-------------------31.48
फरवरी-------16 2007-------55.80-------42.85-------------------30.25
नवंबर-------29 2006-------57.53-------44.85-------------------31.25
जून-------06 2006-------67.30-------47.49-------------------32.45
सितंबर-------06 2005-------59.91-------43.49-------------------30.45
जून-------20 2005-------52.72-------40.49-------------------28.45
नवंबर-------15 2004-------38.82-------37.84-------------------26.28
नवंबर-------04 2004-------38.82-------39.00-------------------26.28
जुलाई-------31 2004-------36.35-------36.81-------------------24.16
जून-------15 2004-------34.22-------35.71-------22.74
मार्च-------01 2004--------00-------33.70-------21.74
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