अतिथि के आने का संदेश देता घर की मुंडेर पर बैठा काला कौआ अब दिखाई नहीं देता है। बिगड़ रहे पर्यावरण की मार कौओं पर भी पड़ी है। हालत यह है कि श्राद्ध में अनुष्ठान पूरा करने के लिए कौए तलाशने से भी नहीं मिल रहे हैं। कौए के विकल्प के रूप में लोग बंदर, गाय और अन्य पक्षियों को भोजन का अंश देकर अनुष्ठान पूरा कर रहे हैं।
भविष्य में झूठ बोलने पर काला कौआ काटने के लिए शायद बचे ही नहीं। एएमयू के वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट के डॉ. अफीफउल्ला कहते हैं कि प्रदूषण के साथ-साथ सिमट रही बायोडायवर्सिटी के कारण कौओं की संख्या तेजी से घटी है। वातावरण असंतुलन के कारण ही गौरैया और बया की तरह कौए लुप्त होने की कगार पर आ गए हैं।
कौए नहीं मिल रहे क्या करें?
रसलगंज स्थित शनि मंदिर के पुजारी अंबिका प्रसाद उपाध्याय कहते हैं कि मान्यता है कि कौओं को खाना खिलाने से वह भोजन सीधे पितरों तक पहुंचता है। अब कौओं के न होने पर बंदर या अन्य पक्षी खाना खा रहे हैं। लोग आकर पूछते हैं कि कौए नहीं मिल रहे हैं तो क्या कर सकते हैं?
खानपान में बदलाव भी है कारण
पर्यावरणविद् सुबोध नंदन का कहना है कि हमारी खान-पान की आदतें बदली हैं। कौए गंदगी खाते हैं। कूड़ा अब पालीथिन में फेंका जाता है। मरे हुए जानवरों की हड्डियों तक में केमिकल होते हैं। खेतों में कीटनाशकों के रूप में जहर फैला हुआ है। अध्ययन से पता चला है कि ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन जिन पशुओं में लगाए गए, उनकी मौत के बाद मांस खाकर पक्षियों की किडनी बर्बाद हो गई। वह पक्षी विलुप्ति की कगार पर आ गए। यही कौओं के साथ भी हुआ है।