अंग्रेजी हुकूमत में कानूनी तौर पर अपराधी घोषित समुदायों के प्रति आजाद भारत में सरकार की अनदेखी को लेकर सुप्रीम कोर्ट गंभीर है। इन जनजातियों की गुहार पर सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से गैर-अधिसूचित घुमंतू व अर्ध-घुमंतू जनजाति राष्ट्रीय आयोग की ओर से 2008 में तैयार की गई रिपोर्ट तलब की है। आजादी के बाद अपराधी के दर्जे से गैर-अधिसूचित किए जा चुके इन समुदायों का आरोप है कि इस रिपोर्ट को जानबूझकर दबाया गया। ताकि 15 करोड़ की जनसंख्या वाली इन जनजातियों को आरक्षण के दायरे से दूर रखा जा सके।
गैर-अधिसूचित जनजातियों के लोगों के हित में दायर याचिका में उन्हें आरक्षण व अन्य लाभ प्रदान करने का मुद्दा उठाया गया है। जस्टिस आरएम लोढ़ा व जस्टिस एआर दवे ने इन समुदायों को लगातार अनदेखा किए जाने की शिकायत पर सरकार को 2008 में तैयार की गई आयोग की रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के सचिव को जुलाई, 2008 में पेश की गई रिपोर्ट पर उठाए गए कदमों की स्थिति के संबंध में हलफनामा दायर करने को कहा है।
इन जनजातियों का मानना है कि आयोग ने रिपोर्ट में गैर-अधिसूचित समुदायों को आरक्षण देने की सिफारिश की है। सर्वोच्च अदालत ने इन समुदायों की आर्थिक और सामाजिक हालत को देखते हुए केंद्र से रिपोर्ट तब तलब की। जब सरकार ने कहा कि इन गैर-अधिसूचित जनजातियों को संवैधानिक दर्जा नहीं प्राप्त है। यह समुदाय अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की सूची में भी शामिल नहीं हैं।
याचिका में कहा गया है कि लंबे समय से अपराधी घोषित होने की वजह से दुर्दिनों में गुजर करने वाली यह जनजातियां देश आजाद होने के बावजूद पिछड़ेपन से त्रस्त हैं। उन्हें सरकार की ओर से लागू किए गए प्रभावी कदमों का लाभ ही नहीं मिल रहा है। जबकि संविधान के अनुसार उन्हें संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि सर्वोच्च अदालत से याचिकाकर्ता एमडी चव्हाण ने सरकार को इन जन-जातियों के लिए नीतियां बनाने के लिए निर्देश जारी करने की मांग की है। इन नीतियों के तहत इन समुदायों के सदस्यों को खाद्य एवं आवास सुरक्षा मुहैया कराने को कहा गया है। ताकि वह स्थायी जीवन गुजार सकें।
कौन हैं क्रिमिनल ट्राइब्स
ब्रिटिश शासन ने 1871 में कई समुदायों को क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के तहत अपराधी के तौर पर अधिसूचित कर दिया था। इन समुदायों के सदस्यों को 1952 में इस कानून को गैर-अधिसूचित किए जाने से पहले पुलिस या प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष हाजिरी देनी पड़ती थी। ऐसा न किए जाने पर उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाता था। इसके अलावा क्षेत्र में अपराध होने की स्थिति में सबसे पहले इन समुदायों के सदस्यों को पकड़ा जाता था।
15 करोड़ जनसंख्या
याचिका के मुताबिक इन जनजातियों की देशभर में जनसंख्या पंद्रह करोड़ है जिसके पास शिक्षा, भूमि, योग्यता और जानकारी नहीं है। लाखों की तादाद में बच्चे कुपोषित हैं और अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं।