आपराधिक रिकॉर्ड वाले जनप्रतिनिधियों पर किए गए एक सर्वे ने भारतीय राजनीति के दामन पर लगे दाग की परतें खोल कर रख दी है।
सर्वे में खुलासा हुआ है कि जिनका आपराधिक रिकॉर्ड जितना बड़ा है उनकी संपत्ति भी उतनी अधिक है। सर्वे के मुताबिक ऐसे जनप्रतिनिधियों ने राजनीति को कमाई का जरिया बना दिया है।
बावजूद इसके राजनीतिक दल टिकट बंटवारे में इन्हें खास तवज्जो देते हैं, क्योंकि उन्हें विजय हासिल करने के मामले में साफ-सुथरी छवि वालों की तुलना में ‘दागदार दामन’ वालों पर ज्यादा भरोसा होता है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से किए गए सर्वे में खुलासा हुआ है कि जिसका आपराधिक रिकॉर्ड जितना बड़ा है उनके पास संपत्ति भी उतनी अधिक है।
आपराधिक रिकॉर्ड वालों की औसत संपत्ति सामान्य सांसदों-विधायकों की औसत संपत्ति के मुकाबले 25 फीसदी ज्यादा है।
इनमें भी गंभीर अपराध करने वाले जनप्रतिनिधि सामान्य अपराध करने वाले प्रतिनिधियों पर भारी हैं। यही नहीं, आपराधिक रिकॉर्ड वाले जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में बढ़ोतरी की रफ्तार भी सामान्य जनप्रतिनिधियों की तुलना में बहुत ज्यादा है।
सर्वे में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि जीत की अधिक संभावना की वजह से राजनीतिक दल टिकट वितरण के मामले में आपराधिक रिकार्ड रखने वालों पर अधिक भरोसा जताते हैं।
राजनीति में आपराधिक रिकॉर्ड वालों का दखल किस कदर बढ़ा है, इस बात का पता पिछले दस साल के चुनावी इतिहास पर नजर डालने से चल जाता है।
इस दौरान चुनाव लड़ने वालों में 18 फीसदी उम्मीदवार आपराधिक रिकॉर्ड वाले थे। हद तो यह है कि कुल 62847 उम्मीदवारों में 5027 के खिलाफ हत्या, बलात्कार और डकैती जैसे संगीन आरोप थे।
वर्ष 2004 से अब तक हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उम्मीदवारों द्वारा चुनाव आयोग के समक्ष भरे गए हलफनामे पर आधारित इस सर्वे में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
मसलन, चुनाव लड़ना अब साधारण लोगों की वश की बात नहीं रह गई है। इसका पता इसी बात से चल जाता है कि वर्ष 2004 से अब तक जिन 62847 लोगों ने चुनाव लड़ा, उनकी औसत संपत्ति 1.37 करोड़ रुपये थी। इस दौरान चुनाव जीतने वाले 8790 सांसदों-विधायकों की औसत संपत्ति 3.83 करोड़ पहुंच गई।
चिंताजनक पहलू यह भी है कि आपराधिक रिकार्ड वाले लोग न केवल बार-बार चुनाव मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं, बल्कि इनकी औसत संपत्ति में बढ़ोतरी की रफ्तार आंखें चौंधिया देने वाली है।
मसलन इस दौरान जिन 4181 लोगों ने दोबारा चुनाव मैदान में ताल ठोकी उनमें से 3173 उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 1.74 करोड़ रुपये से बढ़कर 4.08 करोड़ पर पहुंच गई।
टिकट देने में संकोच नहीं करती पार्टियां
एडीआर के संस्थापक सदस्य त्रिलोचन शास्त्री, प्रो. जगदीप छोकर और राष्ट्रीय संयोजक अनिल बैरवाल ने कहा कि चिंता की बात यह है कि सामान्य उम्मीदवार के मुकाबले आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों की जीत का औसत ज्यादा है। यही कारण है कि राजनीतिक दल आपराधिक रिकार्ड वाले लोगों को बार-बार टिकट देने में संकोच नहीं करते।
सबसे आगे रही शिवसेना
जहां तक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले सांसदों और विधायकों का सवाल है तो इनकी सबसे अधिक संख्या शिवसेना में है। इस दल के 75 फीसदी प्रतिनिधि दागी रिकॉर्ड वाले हैं।
इस मामले में राजद 46 फीसदी के साथ दूसरे और जद-यू 44 फीसदी के साथ तीसरे स्थान पर है। सपा के 43 फीसदी, बसपा के 35 फीसदी, कांग्रेस के 31 फीसदी और भाजपा के 22 फीसदी सांसदों-विधायकों के रिकॉर्ड आपराधिक रहे हैं।