पश्चिम बंगाल के कोयला खदान वाले इस औद्योगिक इलाके में जाने-माने गायक बाबूल सुप्रिय भाजपा उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। हालांकि सीपीएम की उम्मीदें भी उन्हीं पर टिकी हैं, यह सुन कर आश्चर्य हो सकता है।
पिछले 30 वर्षों से लगातार आसनसोल संसदीय सीट पर काबिज रहे सीपीएम की राह इस बार मुश्किल हो गई है। उसके इस गढ़ में सेंध लगाने के लिए सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने एक मजदूर महिला नेता डोला सेन को ही अपना उम्मीदवार बना दिया है।
कांग्रेस उम्मीदवार के मैदान में होने के बावजूद यहां लड़ाई त्रिकोणीय ही है। राज्य की ज्यादातर कोयला खदानें इसी इलाके में हैं और उनमें काम करने वाले मजदूरों का बड़ा हिस्सा हिंदीभाषी है। इस वोट बैंक को भुनाने के लिए ही भाजपा ने बाबूल सुप्रिय को मैदान में उतारा है।
चौधरी की घटी लोकप्रियता का फायदा
सीपीएम को उम्मीद है कि बाबूल तृणमूल कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा कर सीपीएम को इस सीट पर कब्जा बरकरार रखने में सहायता करेंगे। सीपीएम के निवर्तमान सांसद वंशगोपाल चौधरी इस बार यहां से जीत की हैट्रिक बनाने का सपना देख रहे हैं।
पिछले लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के साथ सीधे मुकाबले में चौधरी 72 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से जीते थे। तब कांग्रेस व तृणमूल के बीच तालमेल था। यहां भाजपा उम्मीदवार सूर्य राय को लगभग 50 हजार वोट मिले थे।
बाबूल के रोड शो के दौरान उमड़ती भीड़ ने सीपीएम को राहत दी है। पिछली बार राज्य में सीपीएम की अगुवाई वाली सरकार थी। अब पार्टी विपक्ष में है और कई तरह की समस्याओं से जूझ रही है। चौधरी की लोकप्रियता भी पहले के मुकाबले घटी है।
,,,लेकिन संगठन कमजोर है
राज्य के दूसरे इलाकों के भाजपा उम्मीदवारों की तरह इलाके में बाबूल की राह की सबसे बड़ी समस्या भी संगठन का कमजोर होना है। हालांकि वे इसे खास तवज्जो देने को तैयार नहीं हैं। बाबूल कहते हैं, ‘इलाके के लोगों में मेरी एक पहचान है। लोग नरेंद्र मोदी के नाम और मेरे काम पर वोट देंगे।’ रोड शो के दौरान अक्सर लोग उनसे गाने की फरमाइश भी करते हैं।
इस मौके पर बाबूल अपने गीतों की बजाय किशोर कुमार के कुछ हिट गीतों का मुखड़ा सुना देते हैं। उनकी तरह तृणमूल की डोला सेन ने भी सीपीएम पर इलाके की समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई काम नहीं करने का आरोप लगाया है।
डोला कहती हैं, ‘तीन दशकों के बाद अबकी इलाके के लोगों ने बदलाव का मन बना लिया है। ममता बनर्जी के कामकाज के आधार पर लोग अबकी यहां तृणमूल को ही वोट देंगे।’ लेकिन बाबूल का दावा है कि तीन साल के दौरान ममता सरकार की हकीकत भी लोगों के सामने आ गई है। इसलिए अबकी तो यहां कमल ही खिलेगा।