तमाम घोटालों के खुलासे का हथियार बने चुके सूचना के अधिकार (आरटीआई) की ताकत ने एक महिला को इंसाफ तक पहुंचा दिया। यह कोई कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है उत्तर प्रदेश निवासी मधु की।
मधु ने फर्जी तरीके से लिए गए एकपक्षीय तलाक के आदेश को आरटीआई के शस्त्र से ध्वस्त कर दिया।
आरटीआई के जरिए मिली सूचना को जानने के बाद अदालत ने तलाक के उस आदेश को वापस लिया, जो पत्नी के क्रूर व्यवहार के खिलाफ पति की शिकायत पर दिया गया था।
करीब तीन साल पहले रेलवे में कार्यरत ट्रैफिक इंस्पेक्टर से विवाह करने वाली मधु मिश्रा पर पिछले साल एकपक्षीय तलाक की गाज तब गिरी, जब वह कई माह बाद ससुराल पहुंची।
पति ने कहा कि हमारा तलाक हो चुका है। यह सुनकर वह अवाक रह गई। उसने कहा कि मुझे तो इसकी कोई सूचना तक नहीं है।
ऐसा कैसे हो सकता है कि मेरा पक्ष जाने बिना अदालत तलाक का आदेश कर दे। लेकिन पति ने एक न मानी और उसे चौखट से तलाक का आदेश देकर लौटा दिया।
महिला आदेश देखकर स्तब्ध रह गई और आगरा के परिवार न्यायालय पहुंची। जहां पता लगा कि वाकई अदालत ने तलाक का आदेश जारी किया है, पर यह नाइंसाफी कैसे हुई। यह पता लगाने की मधु ने ठान ली।
परिवार न्यायालय का आदेश एकपक्षीय था जो ससुराल वालों के प्रति क्रूर व्यवहार बरतने के आधार पर दिया गया था। अदालत के रिकॉर्ड से पता लगा कि न्यायालय ने मधु को समन किया था जो डाक विभाग के जरिए रजिस्ट्री से भेजा गया था।
हालांकि महिला के मायके के पते पर हाथरस भेजी गई रजिस्ट्री कभी पहुंची ही नहीं। लेकिन अदालत में समन प्राप्त करने की पोस्टल एडी में महिला के हस्ताक्षर जरूर पहुंच गए।
इसके बाद महिला के पेश न होने पर अदालत ने एकपक्षीय तलाक का आदेश दे दिया।
सच्चाई जानने के लिए महिला ने डाक विभाग में आरटीआई डाली और विभाग ने जवाब में यह स्पष्ट किया कि रजिस्ट्री जिस पते पर भेजी गई थी। वह पता हकीकत में था ही नहीं।
महिला ने आरटीआई को अदालत के समक्ष पेश किया और बताया कि समन की प्राप्ति होने की पुष्टि करने वाली पोस्टल एडी पर उसके फर्जी हस्ताक्षर बनाए गए हैं।
अदालत ने महिला की ओर से आरटीआई के जरिए किए गए खुलासे पर गत वर्ष 3 अगस्त को जारी किए गए तलाक के आदेश को वापस ले लिया।