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केंद्र की रायः आरोप तय होते ही चुनाव लड़ने पर लगे रोक

Tue, 08 Oct 2013 01:29 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
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केंद्र सरकार गंभीर आपराधिक मामलों में अदालत की ओर से आरोप तय होते ही किसी भी व्यक्ति को चुनाव लड़ने के अयोग्य करार देने के पक्ष में है। इस संबंध में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को कहा कि इस मामले को उसने विधि आयोग को सौंप दिया है।
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चुनावों में दबंगों से निजात
केंद्र का कहना है कि राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर अंकुश लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद चुनावों में दबंगों से निजात के लिए कुछ अहम मसले विधि आयोग के हवाले किए गए हैं। हालांकि सरकार ने छह माह के भीतर नेताओं के मुकदमों का निपटारा किए जाने की मांग को अस्वीकार कर दिया है।

विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट
कानून मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कहा है कि विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (1) में उल्लिखित अपराधों में आरोप तय होने पर ही चुनाव के अयोग्य घोषित कर दिया जाए। विधि आयोग का कहना था कि उपधारा एक में दर्शाए गए अपराध चुनाव से संबंधित या संगीन अपराध की श्रेणी में आते हैं।
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इस तरह के अपराधों में लिप्त लोग राजनीतिक पहुंच वाले होते हैं। इस तरह के लोगों को असामाजिक तत्वों का समर्थन हासिल होता है। इस कारण राजनीतिक प्रभावशाली लोगों के खिलाफ गवाही देने से लोग कतराते हैं। इन दबंगों के खिलाफ अपराध साबित करना टेढ़ी खीर है। इसी वजह से सिर्फ आरोप तय होने पर ही उन्हें चुनाव लड़ने से रोकना उचित है।

संसद की स्थायी समिति
अभियोजन पक्ष की तरफ से दाखिल आरोप पत्र और अदालत में पेश सबूतों के आधार पर ट्रायल कोर्ट अभियोग निर्धारित करता है। हलफनामे में कहा गया है कि निर्वाचन आयोग का भी मानना है कि यदि किसी व्यक्ति पर संगीन अपराध में आरोप तय हो गए हैं तो उसे चुनाव प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए यह सही है। लेकिन संसद की स्थायी समिति ने इसके विरोध में अपनी रिपोर्ट दी है।

स्थायी समिति का कहना है कि इस प्रावधान का सत्तारूढ़ दल दुरुपयोग कर सकता है। अभियोजन सत्तारूढ़ दल से प्रभावित हो सकता है और दुर्भावना से प्रेरित होकर राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ इसका प्रयोग किया जा सकता है। यह एक अहम मुद्दा है, इसके महत्व को ध्यान में रखते हुए मसला विधि आयोग को सौंप दिया गया है।

संसद सदस्यता तत्काल प्रभाव से निरस्त
केंद्र ने चुनाव सुधारों पर दायर जनहित याचिका के जवाब में कहा है कि सजायाफ्ता की संसद सदस्यता तत्काल प्रभाव से निरस्त करने के बाद निर्वाचित सांसदों और विधायकों को दिया गया संवैधानिक संरक्षण समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने लिली थॉमस बनाम भारत सरकार के मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4) को असंवैधानिक करार दिया है।

फिलहाल कानून में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, दो संप्रदायों के बीच वैमनस्य पैदा करने पर आईपीसी की धारा 153 ए, मादक पदार्थों की तस्करी, आतंकवादी निरोधक अधिनियम, राष्ट्रध्वज को अपमानित करने और सती प्रथा निवारण अधिनियम के तहत सिर्फ दोषसिद्धि ही अयोग्यता के लिए पर्याप्त है। जबकि बाकी अपराधों में कम से कम दो साल की सजा के बाद ही व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता।

गौरतलब है कि निर्वाचित सांसदों और विधायकों का संवैधानिक संरक्षण हटते ही कई सांसद सुप्रीम कोर्ट के 10 जुलाई के फैसले की गिरफ्त में आकर अपनी सदस्यता से हाथ धोने वाले हैं। विधि आयोग को भेजे गए मसले में राजनीति को आपराधिक तत्वों से मुक्त करने के प्रयास में एक अहम कदम माना जा रहा है।
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