अब तक अपनी जीत के लिए नेहरू गांधी परिवार पर ही आश्रित कांग्रेस को अब नई जमीनी हकीकत से उसके ही कार्यकर्ताओं ने रूबरू कराया है। पार्टी के जिला स्तर तक के कार्यकर्ताओं में बहुमत का मानना है कि कांग्रेस को अब सिर्फ नेहरू गांधी परिवार के वारिसों के भरोसे ही जनता का समर्थन नहीं मिलेगा।
इसके लिए पार्टी को राज्यों और जिलों में भी अपने जुझारू नेताओं को आगे लाकर तैयार करना होगा और केंद्र की भाजपा सरकार की विफलताओं को सड़क से संसद तक पुरजोर तरीकेसे उठाना होगा। जिला स्तर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं की यह राय पिछले दिनों पार्टी नेतृत्व द्वारा देश के करीब 450 जिलों के कार्यकर्ताओं केबीच कराई गई रायशुमारी से निकलकर आई है।
यह जानकारी देने वाले दस जनपथ के करीबी एक कांग्रेसी नेता का कहना है कि इसके बाद पार्टी ने तय किया है कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी (अगर वह राजनीति में सक्रिय होती हैं तो) के चेहरों के साथ साथ अब राज्यों और जिलों में अपना नेतृत्व विकसित करके भाजपा का मुकाबला करेगी।
राहुल युग में प्रवेश कर रही कांग्रेस की यही भावी रणनीति होगी। हाल ही में दिल्ली, महाराष्ट्र, मुंबई, गुजरात, जम्मू एवं कश्मीर और तेलंगाना में जैसे युवा चेहरों को पार्टी की कमान सौंपी गई है,वह पार्टी नेतृत्व की इसी रणनीति का संकेत है।
12 फीसदी कार्यकर्ता नेहरु गांधी परिवार के वारिसों के नाम पर वोट देंगे
इन नतीजों में सिर्फ 12 फीसदी कार्यकर्ताओं ने कहा कि लोग सिर्फ नेहरु गांधी परिवार के वारिसों के नाम पर वोट देंगे। जबकि 88 फीसदी कार्यकर्ताओं की राय है कि पार्टी को भविष्य में वोट लेने के लिए केंद्र की भाजपा सरकार की विफलताओं को पुरजोर तरीके से उठाने, राज्य और जिला स्तर पर नेतृत्व मजबूत करने और लोकसभा व विधानसभा चुनावों में अच्छे और निष्ठावान कांग्रेस कार्यकर्ताओं को टिकट देने होंगे।
दस जनपथ के करीबी इस कांग्रेसी नेता के मुताबिक कुछ दिनों पहले पार्टी नेतृत्व ने देश के करीब 450 जिलों में पार्टी इकाई केपदाधिकारियों को कुछ सवालों वाला एक प्रोफार्मा भेजा था। इसमें पूछा गया था कि क्या जनता सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के नाम पर कांग्रेस को वोट देगी? एक सवाल था कि क्या जनता प्रदेश कांग्रेस में किसी नेता के नाम पर वोट देगी?
एक और सवाल था कि क्या लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जनता कांग्रेस को उम्मीदवार के आधार पर वोट देगी? बताया जाता है कि इस रायशुमारी के नतीजों के विश्लेषण के लिए पार्टी के चार नेताओं को लगाया गया। इस कवायद के बाद जब अंतिम नतीजे सामने आए तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी और दूसरे बड़े नेताओं की बेचैनी खासी बढ़ गई।
'इनके नाम पर ही पार्टी को वोट नहीं मिलेगा'
क्योंकि महज 12 फीसदी पार्टी कार्यकर्ताओं ने राय दी थी कि लोग नेहरू गांधी परिवार के वारिसों के नाम पर कांग्रेस को वोट देंगे। जबकि 88 फीसदी लोगों का कहना था कि नेहरू गांधी परिवार के वारिस पार्टी को एकजुट रखने और नेतृत्व का संघर्ष रोकने के लिए तो कारगर हैं, लेकिन अब सिर्फ इनके नाम पर ही पार्टी को वोट नहीं मिलेगा।
उसके लिए प्रदेश स्तर पर कांग्रेस को ऐसे नेता तैयार करने पड़ेंगे जिनके नाम पर पार्टी चुनाव लड़े, तब जनता उस पर भरोसा करेगी। राय यह भी थी कि केंद्र की मोदी सरकार की असफलताओं का फायदा कांग्रेस को तभी मिल सकता है जबकि वह न सिर्फ उन्हें पुरजोर तरीके से उठाए बल्कि सड़क से संसद तक भाजपा से लड़ती हुई भी दिखाई दे।
इसके लिए पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। वरना भाजपा सरकार की विफलताओं का फायदा दूसरे दल उठा लेंगे जैसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने उठाया।