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नेता प्रतिपक्ष को लेकर कांग्रेस में जबरदस्त सिर फुटव्वल

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लोकसभा चुनाव में मिली बुरी हार के बाद संसद के निचले सदन में नेता प्रतिपक्ष चुनने के मसले पर कांग्रेस पार्टी के दिग्गजों और राहुल ब्रिगेड के बीच खींचतान शुरू हो गई है।
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राहुल ब्रिगेड ने पार्टी के वरिष्ठ नेता कमलनाथ को इस पद पर नियुक्त करने के किसी भी कदम का विरोध करते हुए कहा है कि लोकसभा में पार्टी का चेहरा कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ही होंगे।
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कमलनाथ ने रखी ख्वाह‌िश

लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के अगले दिन ही कमलनाथ ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कर उनके नेता विपक्ष की कुर्सी नहीं संभालने की स्थिति में यह जिम्मेदारी उठाने की इच्छा जताई थी।

पार्टी सूत्रों ने बताया कि कमलनाथ को पार्टी के कुछ ऐसे पुराने दिग्गजों का समर्थन हासिल है, जो लोकसभा चुनाव के दौरान खुद की अनदेखी के लिए राहुल को मजा चखाना चाहते हैं।

मोइली ने कमलनाथ के ख‌िलाफ खोला मोर्चा

दरअसल, कांग्रेस के भीतर की लड़ाई तब सामने आई जब पूर्व पेट्रोलियम मंत्री एम. वीरप्पा मोइली ने कहा कि वह लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता के लिए राहुल गांधी के नाम का समर्थन करते हैं।

मोइली ने यह भी कहा कि हमने पार्टी के असंतुष्टों की कमलनाथ को हमारे ऊपर थोपने की कोशिश का विरोध करने का फैसला किया है। हम इस बारे में अपनी बात सोनिया गांधी के सामने भी रखेंगे।

कांग्रेस में जमकर गुटबाजी

उन्होंने कहा कि अगर चुनाव प्रचार के दौरान राहुल पार्टी का चेहरा थे तो उन्हें विपक्ष का नेता क्यों नहीं होना चाहिए। क्या इससे यह संदेश नहीं जाएगा कि जैसे हमने अपने नेता को किनारे कर दिया है क्योंकि वह उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।

उधर, कांग्रेस की युवा ब्रिगेड के कुछ नेता कमलनाथ का नाम आगे बढ़ाने को पार्टी के कुछ ऐसे असंतुष्टों की साजिश करार दे रहे हैं, जो राहुल को बदनाम कर उनकी छवि को नुकसान पहुंचाना चाहते हैं।

दिलचस्प यह भी है कि केवल 44 सीटें हासिल करने वाली कांग्रेस खुद के दम पर नेता विपक्ष का पद हासिल करने की स्थिति में नहीं है। जानकारों के मुताबिक अगर लोकसभा अध्यक्ष पूरे यूपीए को एक गुट मान लें तो ऐसा संभव हो सकता है। यूपीए के 56 सांसद हैं।
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‘अंग्रेजीदां’ नेतृत्व हार के लिए जिम्मेदार: एनसीपी

चुनाव में हार के लिए एनसीपी ने कांग्रेस के अंग्रेजीदां नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया है।

पार्टी प्रवक्ता नवाब मलिक ने कहा कि भाजपा के नेता सरकार की नीतियों के खिलाफ हिंदी में आक्रामकता के साथ बोलते थे और अधिक से अधिक लोगों से जुड़ते थे लेकिन इस बारे में मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और पी. चिदंबरम की प्रतिक्रिया अंग्रेजी में होती थी, जो चुनाव में हार का एक अहम कारण है।
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