संपूर्ण स्वच्छता अभियान यानि खुले में शौच प्रथा को समाप्त करने का लक्ष्य तभी पूरा होगा, जब लोग अपने दिमाग की गंदगी को साफ करेंगे। देश में जातिवादी व्यवस्था के तहत एक जाति विशेष को स्वच्छता की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। इससे अन्य सभी लोग यह मानकर यहां-वहां गंदगी करते हैं क्योंकि सफाई करने वाले एक जाति के लोग तो हैं ही। यह बात लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने सोमवार को सुलभ इंटरनेशनल सोशल आर्गनाइजेशन की ओर से आयोजित ‘स्वच्छता का समाज शास्त्र’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए कही।
उन्होंने कहा कि संसद यदि अपनी जिम्मेदारी उचित तरीके से नहीं निभाएगी तो सड़क पर जनक्रांतियां होंगी, जिनके रक्तरंजित होने की आशंका है। उन्होंने कहा कि सामाजिक गैर-बराबरी और कुरीतियों को दूर करने के लिए संसद को ही क्रांतियां लाने की जिम्मेदारी निभानी होगी। इसके लिए संसद निर्बाध रूप से चले और कानून बनाने की अपनी जिम्मेदारी निभाता रहे।
समाज के जो लोग निचले पायदान पर हैं, उनके लिए संवेदनशीलता से विचार-विमर्श कर उचित हक और सम्मान दिलाने की जिम्मेदारी संसद की है। कुमार ने कहा कि संपूर्ण स्वच्छता अभियान तब तक सफल नहीं होगा, जब तक सभी लोग अपने दिमाग की सफाई नहीं करते। स्पीकर ने खुले में शौच की प्रथा रोकने के लिए सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डा बिंदेश्वर पाठक और उनके संगठन के महत्वपूर्ण योगदान की इस दौरान सराहना भी की।
ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने बताया कि स्वच्छता कार्य के लिए सरकार के पास धन की कमी नहीं है, बस इसकी सफलता के लिए जुनून की जरूरत है। सामाजिक जुनून के जरिए ही देश भर में खुले में शौच की गंभीर समस्या को दूर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि साठ फीसदी महिलाएं आज भी खुले में शौच करने के लिए मजबूर हैं। केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री भरत सिंह सोलंकी ने कहा कि गंदगी से सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों को उठाना पड़ता है। गंदगी भरे वातावरण में रहने वाले लोग बार-बार बीमार पड़ते हैं। देश के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए स्वच्छता का माहौल बनाना जरूरी है।