गरीबी और हालात उनके सामने दुश्वारियां तो बहुत पैदा कर रही है, लेकिन उनके हौसले को डिगा नहीं पा रही। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर तीन मासूम पेट पालने के लिए भीख मांगते हैं, लेकिन उनमें पढ़ाई कर कुछ कर गुजरने का जज्बा हिलोरे मार रहा है। मंदिर में रोज भगवान के आगे हजारों श्रद्धालु मत्था टेकने तो आते हैं और बच्चों के कटोरे में रुपये, दो रुपये डालकर चले जाते हैं, लेकिन उनके आगे ज्ञान का दान देने वाला कोई हाथ नहीं बढ़ता है। हां, कभी-कभार किसी की नजर उन पर पड़ जाती है तो वह उन्हें होमवर्क दे देता है और बच्चे वहीं बैठे-बैठे उसे पूरा कर लेते हैं।
मुजफ्फरनगर शहर के गांधी कॉलोनी स्थित श्री वैष्णो देवी मंदिर में भक्त रोजाना मां की महिमा का गुणगान करते हैं और मन्नत मांगते हैं, लेकिन इन बच्चों की आरजू केवल पढ़कर कुछ बनने की है। मां की चौखट पर बैठकर यह किसी के लिए प्रेरणा तो बन सकते हैं, लेकिन सपनों को पूरा करने के लिए उन्हें एक लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा और इसके लिए उन्हें सहारे की जरूरत पड़ेगी।
इन बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह भले न देखा हो, लेकिन दूसरे बच्चों को देखकर टीस तो उभरती ही है। बच्चों में सबसे बड़ी करीब आठ साल की मीना मंदिर की चौखट पर ही पढ़ाई करती है। स्कूली बच्चों की तरह वह रोज श्रद्धालुओं द्वारा दिया गया होमवर्क करती है। कुछेक श्रद्धालु बच्चों के कटोरे में रुपये रख देते हैं, कुछ आते-जाते मीना की कॉपी चेक करते हैं।
ऐसे बच्चों को क्या मिलेगा सरकार का सहारा?
मीना कहती है कि वह पढ़ना चाहती है, लेकिन भीख मांगे बिना परिवार का गुजारा नहीं होगा। बूढ़ी दादी के अलावा दो और बच्चे हैं, जो मंदिर से मिलने वाली भीख के सहारे अपना गुजारा कर रहे हैं। दादी ने मंदिर में ही पढ़ाई करने की बात कही तो तमन्नाओं को पंख लगे। कहीं से कॉपी मिल गई और कहीं से पेंसिल।
श्रद्धालुओं ने सहयोग किया तो पढ़ाई की आस पूरी होने लगी। मीना अपना नाम लिखने के अलावा हिंदी और अंग्रेजी का ज्ञान भी रखती है। सरकार की सारी योजनाओं का उपहास उड़ाते इन बच्चों को शायद कोई सहारा मिल जाए, लेकिन अभी ऐसे हजारों बच्चे हैं जिनकी जिंदगी सहारे की आस में खाक छान रही है।
सीतापुर का है परिवार
मीना का परिवार सीतापुर का रहने वाला है। घूम फिरकर जिंदगी बसर करते हैं। साल में करीब चार माह वैष्णो देवी मंदिर में गुजारते हैं। उनके मां-बाप नहीं हैं। दादी कैलाशो देवी ही उनका एकमात्र सहारा है। वह कहती है कि बच्चों को पढ़ाना चाहती है, लेकिन परिवार का पेट पालने के लिए भीख मांगना उनकी मजबूरी है।
मंदिर कमेटी के महामंत्री दिनेश पुंडीर ने बताया कि बच्चे मंदिर की चौखट पर भीख मांगते हैं। रोज पढ़ाई भी करते हैं। श्रद्धालु ही इनके शिक्षक हैं। कोई होमवर्क देता है तो कोई कॉपी चेक करता है। बच्चों का जज्बा सराहनीय है। मंदिर समिति तीनों बच्चों को किसी स्कूल में एडमिशन करा सकती है, लेकिन यह परिवार कुछ महीनों के लिए आता है। बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था की जाएगी।