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दर्दनाक दुनिया: अंधे मां-बाप की परवरिश कर रहे नन्हे-मुन्ने

Fri, 14 Nov 2014 08:53 AM IST
प्रशांत पौरुष/अमर उजाला, हाथरस
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वैसे तो मां-बाप अपने बच्चों की परवरिश करते हैं, लेकिन हाथरस के निकटवर्ती गांव सुरंगपुरा में एक घर में स्थिति बिल्कुल इसके उलट है। वहां दो बच्चे खेलने-कूदने की उम्र में अपने मां-बाप की परवरिश कर रहे हैं।
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दोनों के मां-बाप अंधे हैं और ऐसी स्थिति में दोनों भीख मांगकर अपने और अपने मां-बाप का पेट भर रहे हैं। खेलने-कूदने और पढ़ने की उम्र में इनका बचपन अपने मां-बाप की परवरिश और भीख मांगने में बीता जा रहा है।

निकटवर्ती गांव सुरंगपुरा निवासी दौजीराम रिक्शा चलाकर अपना पेट पालता था। उसकी पत्नी शांति देवी अंधी थी। शांति ने दो बच्चों को भी जन्म दिया। इस बीच दौजीराम के पांव में चोट लग गई। गरीबी से उसका सही उपचार नहीं हो सका और इस चोट ने उसकी आंखों की रोशनी भी छीन ली। हालत यह हो गई पति-पत्नी दोनों ही अंधे हो गए।
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कोई सरकारी इमदाद नहीं

जब दौजीराम के दोनों बच्चों ने होश संभाला तो इन्हें अपने मां-बाप अंधे दिखाई दिए। कमाई का भी कोई जरिया नहीं था। ऐसे में किस्मत ने इनके हाथ में कटोरा पकड़ा दिया। दोनों बच्चे मां-बाप की लाठी बने और घर-घर जाकर भीख मांगने लगे। अब दौजीराम का लड़का शिशुपाल 11 साल का हो गया है और लड़की ऊषा 9 साल की। रहने को टूटा-फूटा कमरा है। पूरे परिवार को कभी कोई सरकारी इमदाद नहीं मिली।

पढ़ने-लिखने और खेलने-कूदने की उम्र में दोनों अपने मां-बाप के साथ भीख मांगने को मजबूर हैं। इन दोनों बच्चों की तमन्ना है कि वह भी पढ़ें-लिखें। और बच्चों की तरह खेलें-कूदें, लेकिन हालात ही इस तरह के नहीं हैं। दो जून के खाने का इंतजाम हो जाए तो यह उसे भी बड़ी चीज मानते हैं। आज यह दोनों अपने मां-बाप का पेट भर रहे हैं, वह भी भीख मांगकर।

किसी की नजर इन पर नहीं पड़ती। जब दोनों को भीख में भी कुछ नहीं मिलता तो कुछ ग्रामीण जरूर मदद कर देते हैं।
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