ब्रिटिश पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने वित्तमंत्री पी चिदंबरम को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताकर कांग्रेस की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। साथ ही उसने कहा है कि 2014 में देश में होने वाले लोकसभा चुनावों में चिदंबरम का पीएम पद के लिए असली मुकाबला भाजपा के नरेंद्र मोदी से होगा।
पत्रिका के एशियाई संस्करण में प्रकाशित लेख में कहा गया है कि चिदंबरम कांग्रेस में तेजी से महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभर रहे हैं। परिस्थितियां उनके पक्ष में हैं। चिदंबरम की स्थिति उस बिल्ली की तरह है, जिसके भाग्य से छींका टूटता है।
पत्रिका के अनुसार लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उम्र 80 पार होगी, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के उत्तराधिकारी माने जा रहे राहुल गांधी अभी तक सरकार में अपनी पारी के लिए तैयार नहीं हैं। द इकोनॉमिस्ट पहले भी राहुल को ‘समस्या’ बता चुकी है।
पत्रिका ने चिदंबरम के नजरिये को विकास की तरफ प्रेरित बताते हुए कहा है कि वह देश को आगे बढ़ने के लिए जरूरी कदम उठाने में सक्षम हैं। उम्र भी उनकी सिर्फ 67 साल है। उनके पास मंत्रिमंडल का अच्छा अनुभव है। पत्रिका ने चिदंबरम की अर्थव्यवस्था की समझ की भी तारीफ की।
पत्रिका ने चिदंबरम के पीएम पद के दावेदार होने के कुछ हालिया संकेतों की तरफ इशारा करते हुए कहा है कि वह पहले से कहीं चतुर राजनेता के रूप में सामने आए हैं। उन्होंने हाल में सर्वदलीय बैठक में डीएमके को एफडीआई के मुद्दे पर सरकार के विरुद्ध वोट न करने के लिए मनाया।
क्या है वजह
द इकोनॉमिस्ट के अनुसार चिदंबरम के एकमात्र प्रतिद्वंद्वी प्रणब मुखर्जी थे, जो पदोन्नत होकर राष्ट्रपति बन चुके हैं। इसके साथ ही चिदंबरम ने सार्वजनिक मंचों पर हिंदी में भाषण देना शुरू किया है, जो भारत में जनसामान्य का नेता होने के लिए जरूरी माना जाता है।
मुकाबला मोदी से
प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए चिदंबरम का मुकाबला सिर्फ नरेंद्र मोदी से है। पत्रिका ने गुजरात चुनाव में मोदी की जीत की संभावनाएं व्यक्त की हैं, लेकिन कहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर उनकी अल्पसंख्यक विरोधी छवि उनके पक्ष में नहीं जाती।
फिर भी चाहिए सोनिया का भरोसा
चिदंबरम के पक्ष में तमाम तर्क देने के बावजूद पत्रिका ने कहा है कि पीएम पद उन्हें तभी मिल सकता है, जब सोनिया गांधी का विश्वास उन पर बना रहे। चिदंबरम की छवि उन नेताओं की नहीं है जो कांग्रेस की नेहरू-गांधी वंशानुगत राजनीति के पीछे चलते हैं। न ही चिदंबरम यह मानने वालों में से हैं कि कांग्रेस को चलाने के लिए नेहरू-गांधी परिवार का नेता अनिवार्य है। चिदंबरम ने 1996 में कांग्रेस छोड़ कर तमिल मनीला कांग्रेस बना ली थी। वह 2004 में पार्टी में लौटे हैं।