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छत्तीसगढ़ के नसबंदी कार्यक्रम ने खड़े किए पांच सवाल

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छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में आयोजित नसबंदी शिविर अब भी चर्चा कि विषय बना हुआ है। इस कार्यक्रम में हुई 15 मौतों ने न सिर्फ छत्तीसगढ़ सरकार को कटघरे में खड़ा किया है बल्कि इस घटना ने दवाओं की स्थानीय स्तरीय जांच प्रक्रिया पर भी बड़े सवाल खड़े किए हैं।
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स्थानीय लोगों के मुताबिक बिलासपुर के पेंडारी गांव में एक सरकारी शिविर लगाया गया था। ग्रामीणों ने दावा किया है कि शिविर में एकमात्र डॉक्टर ने अपने सहयोगी के साथ महज छह घंटे में 83 महिलाओं का ऑपरेशन कर डाला। मगर कुछ महिलाओं की ऑपरेशन के बाद हालत बिगड़ी और बाद में उनकी मौत हो गई। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या महज टार्गेट पूरा करने के लिए इस तरह की लापरवाही को अंजाम दिया जा सकता है।

घटना की गंभीरता को समझते हुए प्रशासन की तरफ से चार डॉक्टरों के निलंबन का आदेश जारी कर दिया गया था। निलंबित होने वाले डॉक्टरो में डॉ. आरके गुप्ता समेत नसबंदी कार्यक्रम के राज्य समन्वयक केसी उरांव, ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी आरके भांगे और प्रखंड चिकित्सा अधिकारी प्रमोद तिवारी थे। गौरतलब है कि डॉ. गुप्ता को पिछले साल ही 50 हजार महिलाओं के आपरेशन करने के लिए पुरस्कृत किया गया था।
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इस घटना को चंद दिन ही बीते हैं लेकिन बिलासपुर के चौक चौराहों में यह चर्चा का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है।
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घटना की न्यायिक जांच पर भी उठे सवाल

सवाल 1- नसबंदी शिविर का आयोजन?
उपलब्ध सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि इस साल नवंबर महीने में बिलासपुर जिले में नसबंदी के लिए 29 शिविर लगने थे। लेकिन उस सूची में पेंडारी और बंद पड़े निजी अस्पताल का कहीं नाम नहीं है। यहां तक कि आठ नवंबर को वहां किसी शिविर का भी कोई जिक्र सरकारी दस्तावेजों में नहीं है।

सवाल 2- न्यायिक जांच का जिम्मा अनीता झा को ही क्यों?
सरकार ने इस पूरे मामले की जांच के लिए जिस सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनीता झा का एकल न्यायिक आयोग बनाया है, उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद छत्तीसगढ़ वाणिज्यिक कर अभिकरण में अध्यक्ष बनने के लिए आवेदन किया है। इस वाणिज्यिक कर विभाग का जिम्मा स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के पास ही है। इसके अलावा सरगुजा में छह जुलाई 2011 को पुलिस द्वारा माओवादी बताकर आदिवासी लड़की मीना खलखो की कथित हत्या के मामले में रमन सिंह सरकार ने 30 अगस्त 2011 को अनीता झा की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग बना कर तीन महीने में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे। आज तीन साल से अधिक होने पर भी इस आयोग की जांच पूरी नहीं हुई है। ऐसी परिस्थिति में सरकार ने फिर से अनीता झा से ही न्यायिक जांच कराने की घोषणा क्यों की?

सवाल 3- दवा की जांच और जांच रिपोर्ट?
नसबंदी ऑपरेशन कांड में महिलाओं की मौत के लिए स्थानीय स्तर पर जांच के बाद सरकार ने सिप्रोसीन 500 दवा को जिम्मेदार माना है। महिलाओं को दूसरी दवाइयां भी दी गई थीं। क्या सरकार ने उनकी जांच कराई? अगर हां तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई और अगर नहीं तो दूसरी दवाओं की जांच क्यों नहीं कराई गई?

सवाल 4- क्या डॉक्टरों पर दबाव था?
राज्य सरकार ने चिकित्सकों को अधिक से अधिक नसबंदी ऑपरेशन करने के लिए लक्ष्य निर्धारित किया है और लक्ष्य की पूर्ति नहीं करने वाले डॉक्टरों के वेतन भी रोके गए हैं? क्या दबाव में डॉक्टर अधिक से अधिक ऑपरेशन करने के लिए बाध्य हुए?

सवाल 5- केवल एक कंपनी के खिलाफ कार्रवाई क्यों?
सरकार ने नसबंदी शिविर के बाद हुई मौतों के कारण 12 दवा और अन्य चिकित्सा सामग्री पर प्रतिबंध लगाया है। लेकिन मामला केवल एक कंपनी महावर फार्मा के खिलाफ ही दर्ज किया गया है। महावर फार्मा पर धारा 420 यानी धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया। दूसरी कंपनियों के ख़िलाफ़ ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
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