फक्कड़, अलमस्त और दुनिया के तमाम लौकिक सुखों से विरक्त संन्यासी भी संगम की रेती पर बनी छावनी में अनुशासन के अधीन होंगे। धर्मध्वजा की स्थापना के साथ ही अखाड़ों के पदाधिकारियों के अधिकार भंग हो गए थे। अब पेशवाई के छावनी प्रवेश के बाद अनुशासन का पाठ आरंभ होगा। इसकी जिम्मेदारी अखाड़ों के कोतवालों की होगी। ये अनुशासन भंग करने वालों को प्रधानों तक ले जाएंगे जो सजा तय करेंगे।
वैदिक रीति और परंपरा के अनुपालन के लिए अखाड़ों की छावनी में 'चेहरा-मोहरा' बनाया जा रहा है। 'चेहरा' अखाड़े का प्रमुख मंच होता है जिस पर कार्यकारिणी 'अष्टकौशल' के सदस्य बैठेंगे और इसे दो तरफ से बंद रखा जाएगा। इस पर चढ़ने के लिए सिर्फ एक ही तरफ से सीढ़ी बनाई गई है। वहीं 'मोहरा' वह जगह होगी जिस पर अखाड़े के महंतों, महामंडलेश्वरों के सोने-चांदी के सिंहासन, हौदे, अस्त्र-शस्त्र रखे जाएंगे। इस पर चढ़ने के लिए कोई सीढ़ी नहीं बनाई जाती ताकि वहां तक कोई न पहुंचे।
'चेहरा' पर अखाड़े के अष्टकौशल में से चुने गए दो प्रधान बैठेंगे जो पूरी जिम्मेदारी संभालेंगे। इस पर कोई गलत रीति से चढ़ा तो दंड तय है। प्रधान के निर्देश पर अखाड़े के कोतवाल की देखरेख में दोषी को संगम में डुबकी लगवाई जाएगी। फिर देव स्थल, 'पुकार स्थल' पर माफी मांगने के बाद ही वह छावनी का सदस्य बनेगा।
निरंजनी अखाड़े के सचिव महंत नरेंद्र गिरि के मुताबिक मुख्य स्नानपर्वो पर महामंडलेश्वर भी इस पर बैठेंगे। पूरे मेले भर अखाड़े के अनुशासन और मर्यादा को बनाए रखने की जिम्मेदारी चेहरा की होगी। चेहरा जो तय करेगा, उसका पालन करना अनिवार्य होगा फिर चाहे वह कोई भी हो।
देवस्थल पर 'पुकार' में चढ़ाई जाएगी भेंट
अखाड़ों में चेहरा-मोहरा के अतिरिक्त देवस्थल भी तैयार हो रहा है जहां आराध्य को भेंट चढ़ाने के लिए 'पुकार' कराई जाएगी। 'दशनाम गुरु सुनना, महामंडलेश्वर फलां की ओर से गुरु महाराज के चरणों में अमुक रकम से 'पुकार' कराई गई।' इसे स्नान पर्व के बाद अखाड़े की छावनी में सचिवों की ओर से अपने महामंडलेश्वरों, पीठाधीश्वरों की ओर से कराया जाएगा। इस दौरान अखाड़े के देवता को जो भी चढ़ावा चढ़ेगा, उसी रकम से अखाड़े का खर्च पूरा होगा।