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नाबालिग की उम्र सीमा नहीं घटाएगी सरकार

Mon, 08 Jul 2013 11:42 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि किशोर न्याय अधिनियम में किसी बदलाव की जरूरत नहीं है।
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देश में किशोरों की ओर से किए जाने वाले अपराधों की संख्या बहुत कम है और इनमें गंभीर प्रकृति के अपराध के मामले और भी कम हैं। ऐसे में जूवेनाइल अधिनियम के तहत संरक्षण दिए जाने की तय उम्र 18 वर्ष को कम करना उचित नहीं होगा।

चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सरकार की ओर से पेश एडीशनल सॉलिसीटर जनरल सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि उम्र घटाने के मसले पर दायर याचिकाओं का उद्देश्य न तो स्पष्ट है और न ही न्यायोचित, क्योंकि गंभीर प्रकृति के अपराध करने वाले किशोरों की संख्या बहुत ही कम है।
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ऐसे में उम्र कम कर सभी किशोरों को इस कानून के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस वर्मा समिति की रिपोर्ट में यथास्थिति बनाए रखने को कहा गया था।

संसद ने भी यही फैसला लिया था। इतना ही नहीं, अधिकतर देश किशोरों को इसी उम्र तक कानून के तहत संरक्षण प्रदान कर रहे हैं।

लूथरा ने हालांकि माना कि 16-18 साल के किशोरों की ओर से अपराध किए जाने के मामले थोड़े बढ़े हैं, लेकिन यदि इस उम्र के लड़कों को बालिग अपराधियों के साथ जेल में डाल दिया जाएगा तो वह शातिर अपराधी बनेंगे और समाज को ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगे।

अधिनियम के प्रावधानों का बचाव करते हुए एएसजी ने कहा कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने कहा है कि जूवेनाइल में 18 साल की उम्र इसलिए रखी गई है ताकि गंभीर आपराधिक ट्रायल से किशोरों को दूर रखा जा सके।
इस संबंध में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मापदंडों को भी स्पष्ट किया है जिनमें सुधार और पुनर्वास सुनिश्चित किया गया है।

पीठ के समक्ष एएसजी ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े पेश करते हुए कहा कि गत दस वर्षों में कुल अपराधों में किशोरों का हिस्सा सिर्फ 1-2 प्रतिशत ही हैं।
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उन्होंने कहा कि जिस तरह से समाज में अपराध बढ़ रहा है उसी तर्ज पर किशोरों का अपराध भी बढ़ रहा है। कुल अपराधों में जूवेनाइल के अपराध में 0.9 प्रतिशत वृद्धि हुई है।
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